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Thursday, May 18, 2017

पहचान न पाया मैं तुमको

(सुनिए यहाँ पर)

वेदाहमेतं पुरुषं महान्तं आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्। 
तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय।।   (यजुर्वेद ३१.१८)
[उस सूर्य समान तेजस्वी और अंधकाररूपी अज्ञान से परे महान् पुरुष (परमात्मा) को मैनें जान लिया है जिसे जानकर ही मोक्ष की प्राप्ति होती है, इससे भिन्न कोई मार्ग ही नहीं है]

सेमल को लाल-लाल सुमन मिले हैं कहाँ से, पीले-पीले ये पुष्प किसने दिए बबूलों को,
तुली तूलिकायें ले ले के सजाता है कौन, सुललित लतिका के कलित दुकूलों को।
'हरिऔध' किसके सजायें ये कलिकायें खिलीं, दे दे दान मंजुल मरंद अनुकूलों को,
ये रंगीन साड़ियाँ तितलियों को कहाँ से मिलीं, कौन रँगरेज रंगता है इन फूलों को।  
(अयोध्या सिंह उपाध्याय "हरिऔध" रचित उपर्युक्त ४ पंक्तियाँ)

पहचान न पाया मैं तुमको, पहचान न पाया मैं तुमको।

फिरा भटकता गिरि, गह्वर में, नगर नगर में, डगर डगर में,
भाटन में, वाटन में, घाटन में, वीतिन में, वृक्षन में, वेलन में,
वाटिका में, वन में, घरन में, दिवारन में, देहरी दरेचन में,
हीरन में, हारन में, भूषण में, तन में,
कानन में, कुंजन में, गोधन, गोपालन में,
गोवन में, गावन में, दामिनी में, घन में,
जित देखूं तित मोहे प्रभु ही दिखाई देत,
प्रभु मेरे छाये रहो नैनन में मन में।

फिरा भटकता गिरि, गह्वर में, नगर नगर में, डगर डगर में
किन्तु पास मेरे तुम हरदम, मैं अब तक भी जान न पाया मैं तुमको
पहचान न पाया मैं तुमको, पहचान न पाया मैं तुमको।

रवि-शशि से पदार्थ चमकाये, अन्न-औषध फल-फूल उगाये
विविध रंगों के फूल लगते भवीले, कैसे अलबेली प्रकृति न टिकी हर साड़ी पे
ज्ञानचक्षु खोल प्रभु महिमा अपार देखो, है न सारे कौतुक ये चेतन अनाड़ी को
बिना घड़ीसाज के न बनती प्रकाश घड़ी, चालक बिना न चलते हैं चक्र गाडी के
बिना वृक्ष बीज बिना तिल कब तेल होता, है न सारे कौतुक ये चेतन खिलाड़ी के।

रवि-शशि से पदार्थ चमकाये, अन्न-औषध फल-फूल उगाये
तुम समान इस जग में कोई दाता दयानिधान न पाया मैं तुमको
पहचान न पाया मैं तुमको, पहचान न पाया मैं तुमको।

जल से धोया मल मल कर तन, धोया नहीं कभी कलुषित मन।

अद्भिर्गात्राणि शुद्धयन्ति मनः सत्येन शुद्धयति। 
विद्यातपोभ्याम भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुद्धयति।।    (मनुस्मृति ५.१०९) 
[शरीर जल से, मन सत्य से, जीवात्मा विद्या व तप से और बुद्धि ज्ञान से शुद्ध होती है]

मन सा न जग में प्रकाश कोई सच्चा मित्र, मन सा न और कोई शत्रु हुड़दंगा है,
मन से ही रीत प्रीत, मन से ही शान्ति गीत, मन से ही कलह कपट द्वेष दंगा है
मन ही मिलाता ईश, मन ही दिलाता मुक्ति, मन ही तो डालता सुकर्म में अड़ंगा है
मन है मरीज तो लजीज कोई चीज नहीं, मन यदि चंगा तो कठौती में ही गंगा है।

जल से धोया मल मल कर तन, धोया नहीं कभी कलुषित मन
धुल जाते त्रयताप ज्ञान की गंग में कर स्नान न पाया मैं तुमको
पहचान न पाया मैं तुमको, पहचान न पाया मैं तुमको।

अखिल विश्व में व्यापक सत्ता, साक्षी दे रहा पत्ता पत्ता।

ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्  
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम ।।    (यजुर्वेद ४०.१)
[इस जगत में सब कुछ ईश्वरमय है, अपने पालन के लिए इसका उपभोग बिना लोभ और आसक्ति से करें]

अखिल विश्व में व्यापक सत्ता, साक्षी दे रहा पत्ता पत्ता
शिशु की बोली में, कोकिल की मधुर कूकों में,
प्रेमी पपीहा की पीपी मयूर हूकों में,
शैल शिखरों में, गगन के विशाल आँगन में,
सिंधु सरिता में, सरोवर में, नगर में, वन में,
नम्र शर्मीले नयन में, पवित्र यौवन में,
हीर प्रणवीर में, दुखिया मजूर निर्धन में,
समा रहा है और मुस्कुरा रहा है जो
नाच सबको ही नित नये नचा रहा है जो
जिसने पानी से भरा है रुहीसी बदरी को
दे दी है जिसने चपलता वाह चमके बिजली को
ईख को दी मिठास और खटास इमली को
रंग दिया है जिसने फूलों को और तितली को
पत्ते पत्ते की न्यारी न्यारी ये कतरन कैसी
हाँथ में जिसने अपने ली नहीं कभी कैंची
रीछ के तन में किया फिट क्या बालों का चोंगा
उम्र भर जो न फटेगा और न छोटा होगा
सिर्फ कुक्कुट के रखा लाल ये मुकुट जिसने
किया लघु बीज से पैदा विशाल वट जिसने
सीप कैसी चमकती आँख बनायी कैसे
बीच में रख दी है तबले जैसी स्याही कैसी
साथ ही इसको वो प्रकाश भी प्रदान किया
दिखाई छोटे से एक तिल में आसमान दिया
जान भी डाल दी इस पञ्चतत्व पुतली में
एक कौड़ी भी न ली इस दया के बदले में
नाम को भी जिसने जलाया न, मशाल, दिया
अँधेरे घर में बैठ वाह क्या कमाल किया
जन्म से पहले ये कौतुक ही बेमिसाल किया
दूध बच्चे की माँ के उर में जिसने डाल दिया
सबको करनी का यथायोग्य जो फल देता है
सदा निष्पक्ष न रिश्वत किसी से लेता है
एकरस है जो जन्मता न मरा करता है
सदा कल्याण का झरना जो झरा करता है
सूखी खेती को जो पल भर में हरा करता है
कीड़ कुञ्जर सभी का पेट भरा करता है
विश्व का चक्र ये जिसके नियम में चलता है
भोर उगता है सूरज सांझ समय ढलता है
पवन बहता है ये पावक प्रचंड जलता है
सिंधु भी देख लो मर्यादा से न टलता है
जिसकी सत्ता के बिना पत्ता तक न हिलता है
जिसकी सत्ता के बिना फूल भी न खिलता है
सारे ब्रह्माण्ड को जो आप किये धारण है
जो कि त्रयताप हरण और तरण-तारण है
जिसका सुमिरन ही सभी विघ्न भय निवारण है
भूल जाना ही जिसे सब दुखों का कारण है
जिसके आगे किसी स्वर्ग बहार कुछ भी नहीं
चक्रवर्ती स्वराज नेहसार कुछ भी नहीं
जिसके आगे कुबेर धन अपार कुछ भी नहीं
जिसके आगे किसी सुंदर का प्यार कुछ भी नहीं
आग चकमक में है जैसे हवा गगन में है,
लाली मेहंदी के पाक में, महक सुमन में है,
जैसे मक्खन दही में, पुतली ज्यों नयन में है,
वैसे ही वो प्रकाश प्राणियों के मन में है।

अखिल विश्व में व्यापक सत्ता, साक्षी दे रहा पत्ता-पत्ता
पाया पता प्रकाश तुम्हारा, तो फिर अपना पता न पाया मैं तुमको
पहचान न पाया मैं तुमको, पहचान न पाया मैं तुमको।।

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Friday, May 6, 2011

तप के प्रकार (भगवदगीता)

जीवन का तप मात्र वन में जाकर ध्यान समाधि लगाने से ही नहीं होता है। जीवन के प्रत्येक आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ व सन्यास) में तप किया जा सकता है। धर्म के बताये मार्ग पर चलते रहकर दृढ अनुशासन से हमेशा कठिन प्रयत्न करते रहना भी तप है। तप से व्यक्ति में विशेष उत्साह और शक्तियां आती हैं। इनका पालन करने से तपोबल आता है, जो कठिन लक्ष्यों को भी अपने प्रभाव से आसान बना देता है।

भगवान् कृष्ण ने गीता में अपने अनमोल वचनों में तप के विभिन्न प्रकार बताये हैं -- शरीर-संबंधी तप, वाणी-संबंधी तप और मन-संबंधी तप ।

१. देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्। ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥ (गीता १७/१४)
देव, विप्र, गुरु और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा -- यह शरीर-संबंधी तप कहलाते हैं।

२. अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥ (गीता १७/१५)
उद्वेग (क्षोभ) न पैदा करने वाला, सत्य, प्रिय और यथार्थ बोलना, वेद-शास्त्रों को पढना और परमात्मा का नाम जपना -- यह वाणी-संबंधी तप कहलाते हैं।

३. मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः। भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥
(गीता १७/१६)
मन की प्रसन्नता, शांतभाव, भगवान् का चिंतन करते हुए कर्म करना, मन पर नियंत्रण और अंतःकरण की पवित्रता -- यह मन-संबंधी तप कहलाते हैं।

Monday, November 16, 2009

In My Father's Words...

"मन लोभी मन लालची, मन चंचल मन चोर।
मन के मत चलिए नहीं, पलक पलक मन और॥
"

(मत = भरोसे)

Saturday, January 31, 2009

अवचेतन मन की सुद्रढ़ता

वेद शास्त्रों में कहा गया है कि "बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, और बुरा मत बोलो" । यही बात महात्मा गाँधी जी ने भी दोहरायी है। इन शब्दों का मतलब हमारी अवचेतन (subconscious) मनोवस्था से है। इन शब्दों को अकर्मण्यता के अर्थ से नहीं समझना चाहिए क्योंकि इनका असली अर्थ हमारे अवचेतन मन से बताया गया है। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि हमको दुष्कर्मों को रोकना नहीं चाहिए।

बुरा देखने से हमारे मन में बुरे विचार आते हैं और अनजाने ही वोह हमारे मन पर प्रभाव छोड़ जाते हैं। यह बुरे चित्र आपके मन में कई तरह से आ सकते हैं, जैसे बुरी फिल्में देखने से, बुरी संगत में रहने से, बुरे व्यवहार को देखने से, बुरे चित्र देखने से आदि।

बुरा सुनने से हमारे विचार प्रदूषित होते हैं। जैसे किसी की बुराई सुनना, किसी की कुटिल बातें सुनना, किसी की अपमानजनक बातों को सुनना और ह्रदय में ले लेना, किसी की घृणा से भरी हुई बातें सुनना। कहते हैं सुनी हुई बातों पर ऐसे ही विश्वास नहीं कर लेना चाहिए।

बुरा बोलना तो कतई भी नहीं चाहिए क्योंकि हम अपनी ही जिह्वा का प्रयोग करके यदि विष भरी बातें दूसरो को सुनायेंगे, तो उन पर हमारा भी भरोसा बढता जायेगा। हमारी आत्मा सब जानती है, वह जानती है की हम कितना सच और कितना झूठ बोल रहे हैं। अपने आप को इश्वर का एक अंश मानकर हमेशा सत्य की राह पर चलना चाहिए। कभी अनजाने में, क्रोध में असत्य वचन जरुर निकलेगा, लेकिन सत्य पर चलने के लिए अभ्यास करते रहना चाहिए। अगर किसी को अपनी भूल का अहसास हो जाए, उसे तो भगवान् भी माफ़ कर देते हैं। यही सोच कर हमने जो ग़लत बोला है, वह भविष्य में न हो, इसका प्रयत्न करना चाहिए।

अंत में तुलसीदास जी की कुछ पंक्तियाँ सुनाता हूँ, जिनमें उन्होंने दृढ़ यानी अडिग चीजों का वर्णन करते हुए संज्ञा दी है: एक तो अंगद का पैर, दूसरा सती मन
वो कहते हैं...
भूमि न छांड़त कपि चरन देखत रिपु मद भाग ।
कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग॥
वानर अंगद का चरन पृथ्वी नहीं छोड़ रहा था जैसे करोड़ों विघ्न आने पर भी संत का मन नीति नहीं छोड़ता है। यह देख कर शत्रुओं का मद (घमंड) दूर हो गया।

दूसरी जगह पर वो सती मन की तुलना शिव धनुष से करते हैं। जब घमंडी राजाओं ने सीता स्वयम्वर में शिव धनुष को उठाने की लाख चेष्टा की थी और वह हिला भी नहीं था। तब संत तुलसी कहते हैं...
डगहि न संभु सरासन कैसे। कामी बचन सती मन जैसे॥
संभु अर्थात शिव, और सरासन अर्थात धनुष। शिव धनुष अडिग था इस तरह, जैसे किसी कामी के वचन से सती स्त्री का मन नहीं डोलता है।

इन बातों का तात्पर्य यही है कि हमको अपने अवचेतन मन को सुद्रढ़ बनाना चाहिए। सुद्रढ़ अर्थात सु+दृढ। अच्छी बातों से तीनों इन्द्रियों (आँख, कान और मुंह) से वही ग्रहण करना चाहिए जो हमें नीति के मार्ग पर ले जाए। यही हमारा मंगल करेगा क्योंकि, जो हम बोयेंगे, वही काटेंगे। यह तो बस समय की बात है।