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Friday, January 15, 2010

बिन प्रेम के भगवान नहीं

तुलसीदास जी कहते हैं...

मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किएँ जोग तप ग्यान बिरागा।।
कोई कितना भी योग, तप, ज्ञान या वैराग्य का पालन करे, उसको भगवान नहीं मिलेंगे जिसके मन में उनके लिए सच्चा प्रेम नहीं होगा।


हरि ब्यापक सर्वत्र समाना। प्रेम ते प्रगट होंहि मैं जाना॥
भगवान हर जगह व्याप्त हैं। किसी को उन्हें कुछ दिखाने की जरुरत नहीं है। उन्हें आपके मन और जीवन दोनों की स्थिति का पूरा ज्ञान है। लेकिन वो प्रकट होते हैं, तो केवल उसी के लिए, जिसके मन में उनके लिए सच्चा प्रेम हो।

Wednesday, February 4, 2009

क्रिया योग (Duties of Beings)

पातंजलि योग सूत्र के साधन पाद में ऋषिवर कहते हैं...
तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः॥

अर्थ -- तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि -- तप, स्वाध्याय और ईश्वर-शरणागति -- यह तीनों; क्रियायोगः - क्रिया योग हैं।

(१) तप -- अपने वर्ण, आश्रम, परिस्थिति और योग्यता के अनुसार स्वधर्म का पालन करना और उसके पालन में जो शारीरिक या मानसिक अधिक-से-अधिक कष्ट प्राप्त हों, उन्हें सहर्ष सहन करना -- इसका नाम 'तप' है।

आश्रम का अर्थ है कि चार आश्रमों में से जिसमे आप आते हों, उसका दृढ़ता से पालन करें। गृहस्थ वाले गृहस्थ का, ब्रह्मचर्य वाले ब्रह्मचर्य का आदि। अनंत कष्टों को सहन करके जो इनका पालन करते हैं, वोह ही सच्चे योगी हैं। निष्कामभाव से इस तप का पालन करने से मनुष्य का अंतःकरण अनायास ही शुद्ध हो जाता है, यह भगवान् कृष्ण द्वारा कथित गीता में कर्मयोग का ही एक अंग है।

(२) स्वाध्याय -- जिनसे अपने कर्तव्य-अकर्तव्य का बोध हो सके, ऐसे वेद, शास्त्र, महापुरुषों के लेख, सत्संग आदि का पठन-पाठन और भगवान् के ॐ कार आदि किसी नाम का या गायत्री का और किसी भी इष्टदेवता के मन्त्र का जप करना 'स्वाध्याय' है। इसके सिवा अपने जीवन के अध्ययन का नाम भी स्वाध्याय है।

इन प्रकार से प्राप्त ज्ञान हमको ये सिखाता है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए और हमको अपने दोषों को कितनी कट्टरता से दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए। अतः साधक को प्राप्त विवेक (यानी बुद्धि) के द्वारा अपने दोषों को खोज कर निकालते रहना चाहिए। सारे दोषों के ७ मूल (यानी कारण) हैं -- काम (desires), क्रोध (anger), लोभ (greed), मोह (attachment), माया (materialism), मद (pride) और मत्सर (envy) हैं। एक एक करके इन पर काबू पाने से स्वभाव निर्मल और दुःख दूर हो जाते हैं।

(३) ईश्वर-प्रणिधा -- ईश्वर के शरणापन्न हो जाने का नाम भी 'ईश्वर-प्रणिधान' है। उसके नाम, रूप, लीला, धाम, गुण और प्रभाव आदि का श्रवण, कीर्तन और मनन करना, समस्त कर्मों को भगवान् के समर्पण कर देना, अपने को भगवन के हाथ का यन्त्र बनाकर उसकी आगया पर नाचना, उसकी आज्ञा का पालन करना, उसीमें अनन्य प्रेम करना -- ये सभी ईश्वर-प्रणिधान के अंग हैं।