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Sunday, April 18, 2010

प्रेम में कपट का स्थान नहीं...

तुलसीदास जी कहते हैं...प्रेम में कपट का कोई स्थान नहीं होता...

जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि।
बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि॥ [बालकाण्ड सोo ५७ (ख)]

प्रीति की सुंदर रीति देखिये कि जल भी [दूध के साथ मिलकर] दूध के समान भाव बिकता है; परन्तु फिर कपटरुपी खटाई पड़ते ही पानी अलग हो जाता है [दूध फट जाता है] और स्वाद (प्रेम) जाता रहता है।