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Tuesday, November 25, 2014

नर हो, न निराश करो मन को

मैथिली शरण गुप्त जी की सुन्दर पंक्तियाँ...

नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को ।

संभलो कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलम्बन को
नर हो, न निराश करो मन को
जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को ।

निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
मरणोंत्‍तर गुंजित गान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
कुछ हो न तज़ो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को ।

प्रभु ने तुमको दान किए
सब वांछित वस्तु विधान किए
तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो
फिर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को ।

किस गौरव के तुम योग्य नहीं
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
जान हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को ।

करके विधि वाद न खेद करो
निज लक्ष्य निरन्तर भेद करो
बनता बस उद्‌यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि है
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो ।  

Friday, August 21, 2009

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Saturday, January 31, 2009

सरस्वती वंदना

आज वसंत पंचमी का पर्व है। सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएं !!! आज के दिन सरस्वती वंदना अवश्य करनी चाहिए पीले वस्त्र धारण करके। आपके लिए यह वंदना मैं लिखता हूँ, जो मुझे सरस्वती शिशु मन्दिर में सीखने को मिली थी...

या कुन्देन्दु तुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमन्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवै: सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेषजाड्यापहा॥


शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणा-पुस्तक धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्।
हस्ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ॥

Saturday, February 23, 2008

Rahim on Love

'रहिमन' पैड़ा प्रेम को, निपट सिलसिली गैल।
बिलछत पांव पिपीलिको, लोग लदावत बैल॥


प्रेम की गली में कितनी ज्यादा फिसलन है! चींटी के भी पैर फिसल जाते हैं इस पर। और, हम लोगों को तो देखो, जो बैल लादकर चलने की सोचते है! (दुनिया भर का अहंकार सिर पर लादकर कोई कैसे प्रेम के विकट मार्ग पर चल सकता है? वह तो फिसलेगा ही।)

'रहिमन' प्रीति सराहिये, मिले होत रंग दून।
ज्यों जरदी हरदी तजै, तजै सफेदी चून॥

सराहना ऐसे ही प्रेम की की जाय जिसमें अन्तर न रह जाय। चूना और हल्दी मिलकर अपना-अपना रंग छोड़ देते है। (न दृष्टा रहता है और न दृश्य, दोनों एकाकार हो जाते हैं।)

कहा करौं वैकुण्ठ लै, कल्पबृच्छ की छांह।
'रहिमन' ढाक सुहावनो, जो गल पीतम-बाँह॥

वैकुण्ठ जाकर कल्पवृक्ष की छांहतले बैठने में रक्खा क्या है, यदि वहां प्रियतम पास न हो! उससे तो ढाक का पेड़ ही सुखदायक है, यदि उसकी छांह में प्रियतम के साथ गलबाँह देकर बैठने को मिले।

जे सुलगे ते बुझ गए, बुझे ते सुलगे नाहिं।
'रहिमन' दाहे प्रेम के, बुझि-बुझिकैं सुलगाहिं॥

आग में पड़कर लकड़ी सुलग-सुलगकर बुझ जाती है, बुझकर वह फिर सुलगती नहीं। लेकिन प्रेम की आग में दग्ध हो जाने वाले प्रेमीजन बुझकर भी सुलगते रहते है। (ऐसे प्रेमी ही असल में 'मरजीवा' हैं।)

यह न 'रहीम' सराहिये, देन-लेन की प्रीति।
प्रानन बाजी राखिये, हार होय कै जीत॥

ऐसे प्रेम को कौन सराहेगा, जिसमें लेन-देन का नाता जुड़ा हो! प्रेम क्या कोई खरीद-फरोख्त की चीज है? उसमें तो लगा दिया जाय प्राणों का दांव, परवा नहीं कि हार हो या जीत!

'रहिमन' मैन-तुरंग चढ़ि, चलिबो पावक माहिं।
प्रेम-पंथ ऐसो कठिन, सब कोउ निबहत नाहिं॥

प्रेम का मार्ग हर कोई नहीं तय कर सकता। बड़ा कठिन है उस पर चलना, जैसे मोम के बने घोड़े पर सवार हो आग (पावक) पर चलना।

- Dohas provided by unknown friend

Friday, February 22, 2008

Rahim on life lessons

जैसी जाकी बुद्धि है, तैसी कहै बनाय।
ताको बुरो न मानिये, लेन कहां सूँ जाय॥


जिसकी जैसी जितनी बुद्धि होती है, वह वैसा ही बन जाता है, या बना-बना कर वैसी ही बात करता है। उसकी बात का इसलिए बुरा नहीं मानना चाहिए। कहां से वह सम्यक बुद्धि लेने जाय?


खरच बढ्यो उद्यम घट्यो, नृपति निठुर मन कीन।
कहु 'रहीम' कैसे जिए, थोरे जल की मीन॥


राजा भी निठुर बन गया, जबकि खर्च बेहद बढ़ गया और उद्यम मे कमी आ गयी। ऐसी दशा में जीना दूभर हो जाता है, जैसे जरा से जल में मछली का जीना।


खीरा को सिर काटिकै, मलियत लौन लगाय।
'रहिमन' करुवे मुखन की, चहिए यही सजाय॥


चलन है कि खीरे का ऊपरी सिरा काट कर उस पर नमक मल दिया जाता है। कड़ुवे वचन बोलनेवाले की यही सजा है।


सब कोऊ सबसों करें, राम जुहार सलाम।
हित अनहित तब जानिये, जा दिन अटके काम॥


आपस में मिलते हैं तो सभी सबसे राम-राम, सलाम और जुहार करते हैं। पर कौन मित्र है और कौन शत्रु, इसका पता तो काम पड़ने पर ही चलता है। तभी, जबकि किसीका कोई काम अटक जाता है।


'रहिमन' जिव्हा बावरी, कहिगी सरग पताल।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल॥


क्या किया जाय इस पगली जीभ का, जो न जाने क्या-क्या उल्टी-सीधी बातें स्वर्ग और पाताल तक की बक जाती है! खुद तो कहकर मुहँ के अन्दर हो जाती है, और बेचारे सिर को जूतियाँ खानी पड़ती है!


'रहिमन' तब लगि ठहरिए, दान, मान, सनमान।
घटत मान देखिय जबहिं, तुरतहि करिय पयान॥

तभी तक वहां रहा जाय, जब तक दान, मान और सम्मान मिले। जब देखने में आये कि मान-सम्मान घट रहा है, तो तत्काल वहां से चल देना चाहिए।


धन थोरो, इज्जत बड़ी, कहि 'रहीम' का बात।
जैसे कुल की कुलबधू, चिथड़न माहिं समात ॥

पैसा अगर थोडा है, पर इज्जत बड़ी है, तो यह कोइ निन्दनीय बात नहीं । खानदानी घर की स्त्री चिथड़े पहनकर भी अपने मान की रक्षा कर लेती हैं ।


अन्तर दावा लगि रहै, धुआं न प्रगटै सोय।
के जिय जाने आपनो, जा सिर बीती होय॥

आग अन्तर में सुलग रही है, पर उसका धुआं प्रकट नहीं हो रहा है। जिसके सिर पर बीतती है, उसीका जी उस आग को जानता है। कोई दूसरे उस आग का यानी दु:ख का मर्म समझ नहीं सकते।


कदली,सीप,भुजंग मुख, स्वाति एक गुन तीन।
जैसी संगति बैठिए, तैसोई फल दीन॥


स्वाती नक्षत्र की वर्षा की बूँद तो एक ही हैं, पर उसके गुण अलग-अलग तीन तरह के देखे जाते है ! कदली में पड़ने से, कहते है कि, उस बूंद का कपूर बन जाता है ! ओर,अगर सीप में वह पड़ी तो उसका मोती हो जाता है ! साप के मुहँ के में गिरने से उसी बूँद का विष बन जाता है ! जैसी संगत में बैठोगे, वेसा ही परिणाम उसका होगा ! (यह कवियों की मान्यता है, ओर इसे 'कवि समय' कहते है! )


काह कामरी पामड़ी, जाड़ गए से काज ।
'रहिमन' भूख बुताइए, कैस्यो मिले अनाज ॥


क्या तो कम्बल और क्या मखमल का कपड़ा ! असल में काम का तो वही है, जिससे कि जाड़ा चला जाय । खाने को चाहे जैसा अनाज मिल जाय, उससे भूख बुझनी चाहिए । (तुलसीदासजी ने भी यही बात कही है कि ;-
का भाषा, का संस्कृत, प्रेम चाहिए साँच ।
काम जो आवै कामरी, का लै करै कमाच ॥)


ससि संकोच, साहस, सलिल, मान, सनेह 'रहीम' ।
बढ़त-बढ़त बढ़ि जात है, घटत-घटत घटि सोम ॥


चन्द्रमा, संकोच, साहस, जल, सम्मान और स्नेह, ये सब ऐसे है, जो बढ़ते-बढ़ते बढ़ जाते हैं, और घटते-घटते घटने की सीमा को छू लेते हैं ।


जैसी परै सो सहि रहे , कहि 'रहीम' यह देह ।
धरती ही पर परग है , सीत, घाम औ' मेह ॥

जो कुछ भी इस देह पर आ बीते, वह सब सहन कर लेना चाहिए । जैसे, जाड़ा, धूप और वर्षा पड़ने पर धरती सहज ही सब सह लेती है । सहिष्णुता धरती का स्वाभाविक गुण है ।


जो बड़ेन को लघु कहै, नहिं 'रहीम' घटि जाहिं ।
गिरिधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाहिं ॥

बड़े को यदि कोई छोटा कह दे, तो उसका बड़प्पन कम नहीं हो जाता । गिरिधर श्रीकृष्ण को मुरलीधर कहने पर कहाँ बुरा मानते हैं ?


जो 'रहीम' मन हाथ है, तो तन कहुँ किन जाहि ।
जल में जो छाया परे ,काया भीजति नाहिं ॥

मन यदि अपने हाथ में है, अपने काबू में है, तो तन कहीं भी चला जाय, कुछ बिगड़ने का नहीं । जैसे काया भीगती नहीं है, जल में उसकी छाया पड़ने पर । [जीत और हार का कारण मन ही है, तन नहीं : 'मन के जीते जीत है, मन के हारे हार '।]


बड़े बड़ाई ना करैं , बड़ो न बोले बोल ।
'रहिमन' हीरा कब कहै, लाख टका मम मोल ॥

जो सचमुच बड़े होते हैं, वे अपनी बड़ाई नहीं किया करते, बड़े-बड़े बोल नहीं बोला करते । हीरा कब कहता है कि मेरा मोल लाख टके का है । [छोटे छिछोरे आदमी ही बातें बना-बनाकर अपनी तारीफ के पुल बाँधा करते हैं ।]


भार झोंकि कै भार में, 'रहिमन' उतरे पार ।
पै बूड़े मँझधार में , जिनके सिर पर भार ॥

अहम् को यानी खुदी के भार को भाड़ में झोंककर हम तो पार उतर गये । बीच धार में तो वे ही डूबे, जिनके सिर पर अहंकार का भार रखा हुआ था, या जिन्होंने स्वयं भार रख लिया था ।


यह 'रहीम' निज संग लै, जनमत जगत न कोय ।
बैर, प्रीति, अभ्यास, जस होत होत ही होय ॥

बैर, प्रीति, अभ्यास और यश इनके साथ संसार में कोई भी जन्म नहीं लेता । ये सारी चीजें तो धीरे-धीरे ही आती हैं ।


यों 'रहीम' सुख दुख सहत , बड़े लोग सह सांति ।
उवत चंद जेहिं भाँति सों , अथवत ताही भाँति ॥

बड़े आदमी शान्तिपूर्वक सुख और दुःख को सह लेते हैं । वे न सुख पाकर फूल जाते हैं और न दुःख में घबराते हैं । चन्द्रमा जिस प्रकार उदित होता है, उसी प्रकार डूब भी जाता है ।


'रहिमन' चुप ह्वै बैठिए, देखि दिनन को फेर ।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर ॥

यह देखकर कि बुरे दिन आगये, चुप बैठ जाना चाहिए । दुर्भाग्य की शिकायत क्यों और किस से की जाय ? जब अच्छे दिन फिरेंगे, तो बनने में देर नहीं लगेगी । इस विश्वास का सहारा लेकर तुम चुपचाप बैठे रहो ।


'रहिमन' तीन प्रकार ते, हित अनहित पहिचानि ।
पर-बस परे, परोस-बस, परे मामिला जानि ॥


क्या तो हित है और क्या अनहित, इसकी पहचान तीन प्रकार से होती है: दूसरे के बस में होने से, पड़ोस में रहने से और मामला मुकदमा पड़ने पर ।


'रहिमन' निज मन की बिथा, मनही राखो गोय ।
सुनि अठिलैहैं लोग सब , बाँटि न लैहैं कोय ॥

अन्दर के दुःख को अन्दर ही छिपाकर रख लेना चाहिए, उसे सुनकर लोग उल्टे हँसी करेंगे कोई भी दुःख को बाँट नहीं लेगा ।


'रहिमन' मनहिं लगाईके, देखि लेहु किन कोय ।
नर को बस करिबो कहा, नारायन बस होय ॥

मन को स्थिर करके कोई क्यों नहीं देख लेता, इस परम सत्य को कि, मनुष्य को वश में कर लेना तो बात ही क्या, नारायण भी वश में हो जाते हैं ।


'रहिमन' मारग प्रेम को, मत मतिहीन मझाव ।
जो डिगहै तो फिर कहूँ, नहिं धरने को पाँव ॥

हाँ, यह मार्ग प्रेम का मार्ग है । कोई नासमझ इस पर पैर न रखे । यदि डगमगा गये तो, फिर कहीं पैर धरने की जगह नहीं । मतलब यह कि बहुत समझ-बूझकर और धीरज और दृढ़ता के साथ प्रेम के मार्ग पर पैर रखना चाहिए ।


'रहिमन' रिस को छाँड़ि के, करौ गरीबी भेस ।
मीठो बोलो, नै चलो, सबै तुम्हारी देस ॥

क्रोध को छोड़ दो और गरीबों की रहनी रहो । मीठे वचन बोलो और नम्रता से चलो, अकड़कर नहीं । फिर तो सारा ही देश तुम्हारा है ।


राम न जाते हरिन संग, सीय न रावन-साथ ।
जो 'रहीम' भावी कतहुँ, होत आपने हाथ ॥


होनहार (या 'होनी') यदि अपने हाथ में होती, उस पर अपना वश चलता, तो माया-मृग के पीछे राम क्यों दौड़ते, और रावण क्यों सीता को हर ले जाता !


स्वासह तुरिय जो उच्चरे, तिय है निहचल चित्त ।
पूरा परा घर जानिए, 'रहिमन' तीन पवित्त ॥

ये तीनों परम पवित्र हैं :- वह स्वास, जिसे खींचकर योगी त्वरीया अवस्था का अनुभव करता है, वह स्त्री, जिसका चित्त पतिव्रत में निश्चल हो गया है, पर पुरुष को देखकर जिसका मन चंचल नहीं होता । और सुपुत्र,[जो अपने चरित्र से कुल का दीपक बन जाता है।]


- provided and contributed by an unknown friend

Friday, February 1, 2008

On Passing Moments of Life...

(आप की कसम) by Kishore Kumar

This beautiful hindi song from Kishore cuts through emotional turmoils and teaches the importance of genuine understanding of moments of life, love and four days of moonlight. The voice with its sentimentality adds magic to this song portrayed by no other than the master and my favorite, Rajesh Khanna.

जिंदगी के सफर में, गुज़र जाते हैं जो मुकाम,
वह फिर नहीं आते, वह फिर नहीं आते।


फूल खिलते हैं, लोग मिलते हैं।
फूल खिलते हैं, लोग मिलते हैं मगर
पतझड़ में जो फूल मुरझा जाते हैं
वो बहारों के आने से खिलते नहीं
कुछ लोग इक रोज़ जो बिछड़ जाते हैं
वो हज़ारों के आने से मिलते नहीं
उम्र भर चाहे कोई पुकारा करे उनका नाम
वह फिर नहीं आते, वह फिर नहीं आते।
ज़िंदगी के सफर में...

आँख धोखा है, क्या भरोसा है
आँख धोखा है, क्या भरोसा है सुनो
दोस्तों शक दोस्ती का दुश्मन है
अपने दिल में इसे घर बनाने ना दो
कल तड़पना पडे याद में जिनकी
रोक लो रूठ कर उनको जाने ना दो
बाद में प्यार के चाहे भेजो हज़ारों सलाम
वह फिर नहीं आते, वह फिर नहीं आते।
ज़िंदगी के सफर में...


सुबह आती है, रात जाती है
सुबह आती है, रात जाती है यूँही
वक़्त चलता ही रहता है रुकता नहीं
इक पल में ये आगे निकल जाता है
आदमी ठीक से देख पाता नहीं
और पर्दे पे मंज़र बदल जाता है
इक बार चले जाते हैं जो दिन-रात सुबह-ओ-शाम
वह फिर नहीं आते, वह फिर नहीं आते।
ज़िंदगी के सफर में...


To hear and watch this song, click here.
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(गोलमाल) by Kishore Kumar

Kishore sings on the eternal truth of nature that brings the cycles of laughs and cries and how one must not waste its moments in the false senses of mind. It says the time is here for you to spend in memorable ways that bring cheers to all.

आने वाला पल जाने वाला है - २
हो सके तो इसमे जिंदगी बिता दो पल जो ये जाने वाला है
आने वाला पल...

इक बार यूं मिली मासूम सी कली - २
खिलते हुए कहा पुषपाश मैं चली

देखा तो यहीं है, ढूँढा तो नहीं है
पल जो ये जाने वाला है

आने वाला पल...

इक बार वक़्त से लम्हा गिरा कहीं - २
वहाँ दास्ताँ मिली लम्हा कहीं नहीं
थोडा सा हंसा के थोडा सा रुला के
पल ये भी जाने वाला है
आने वाला पल... - २

To hear and watch this song, click here.
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(आ गले लग जा) by Kishore Kumar & Shushma Shreshtha

Shushma & Kishore in the roles of son and his dad talk about love as being a relationship that is generations old and repeated over and over in many lives among the two. (Some say, I look and smile like Shashi Kapoor. :-) )


तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई, यूँही नहीं दिल लुभाता कोई - २
जाने तू या जाने ना

माने तू या माने ना

देखो अभी खोना नहीं, कभी जुदा होना नहीं - २
अबकी यूँही मिले रहने दो ना
वादा रहा ये इस शाम का
जाने तू या जाने ना
माने तू या माने ना
तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई, यूँही नहीं दिल लुभाता कोई - २


वादे गए बातें गईं
जागी जागी रातें गयीं
चाहा जिसे मिला नहीं
तो भी हमे गिला नहीं
अपना है क्या जियें मरें चाहे कुछ हो
तुझको तो जीना रास आ गया
जाने तू या जाने ना
माने तू या माने ना
तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई, यूँही नहीं दिल लुभाता कोई - २


To hear and watch this song, click here. There is another version of this song with different lyrics, if you want the romantic version.
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