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Wednesday, August 19, 2009

प्रेम

कबीर दास जी कहते हैं...

प्रेम न बारी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रूचै, सीस देइ लै जाय॥

प्रेम न तो खेत या बाड़े में उगता है और न ही हाट में बिकता है। चाहे राजा हो या प्रजा, जिसको सच्चा प्रेम चाहिए उसे अपना शीश तक देना पड़ता है क्योंकि किंचितमात्र अभिमान रखकर प्रेम नहीं किया जा सकता।

प्रेम पियाला जो पिए, सीस दक्षिना देय।
लोभी सीस न दे सके, नाम प्रेम का लेय॥

जिसको सच्चे प्रेम का रस चखना है, उसको अपने शीश को दक्षिणा में देना पड़ता है अर्थात उसे अभिमान का त्याग करना होता है। किंतु जो यह नहीं कर सकता और प्रेम का नाम लेता है, वह तो लोभी है जिसके अंदर त्याग की भावना नहीं हो सकती।

प्रेम भाव एक चाहिए, भेष अनेक बनाय।
चाहे घर में बास कर, चाहे बन को जाय॥

अपने अंदर प्रेम का भाव एक ही होना चाहिए, चाहे उसे आप जैसे भी दिखाएँ। कबीर दास जी भगवान् राम और भरत के प्रेम की ओर संकेत करके कहते हैं कि दोनों का प्रेम एक ही समान और अतुलनीय था। एक ने पिता के प्रति अपने प्रेम को वन जाकर निभाया था और दूसरे ने अपने भाई के प्रति प्रेम को राजमहल में सिंघासन पर खडाऊ रखकर निभाया था।

जे घट प्रेम न संचरै, ते घट जान समान।
जैसे खाल लुहार की, सांस लेत बिनु प्रान॥

जिसके हृदय में प्रेम नहीं है, वह जीव शमशान के सदृश्य भयानक एवं त्याज्य होता है। जिस प्रकार लुहार की धौंकनी के भरी हुई खाल बग़ैर प्राण के सांस लेती है उसी प्रकार वह जीव भी प्रेम के बिना मृत के समान शमशान स्वरुप होता है।

जल में बसै कमोदिनी, चंदा बसै अकास।
जो है जाको भावना, सो ताही के पास॥

जैसे कमल जल में खिलता है, चंद्रमा आकाश में रहता है। इस दुनिया की भी यही रीति है कि जिसको जो भाता है, वह उसी के पास रहता है।

भक्ति भाव भादों नदी, सबै चलीं घहराय।
सरिता सोइ सराहिये, जो जेठ मास ठहराय॥

वैसे तो भक्ति, भावना और वर्षा ऋतु (भादों) की नदी सभी घहरे दिखते हैं। लेकिन सराहना उसी की करनी चाहिए जो विपत्ति में भी साथ दे, जैसे नदी वही सराहनीय है जो गर्मी की ऋतु में भी जल देती है।

जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ, गहिरे पानी पैठ।
जो बौरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ॥

जिसने सच्चे प्रेम को ढूँढा, उसको वह मिल गया। लेकिन इसके लिए प्रेम की अनजान गहराइयों में उतरना पड़ता है। जो पागल इन गहराइयों में डूबने से डर गया, उसको प्रेम नहीं मिलता क्योंकि वह छिछले धरातल (किनारे) पर ही बैठा रह गया।

कहते हैं, हर रचना में अर्थ पर पाठक का अधिकार होता है, न कि कवि का। वही दुस्साहस करके मैंने इन दोहों के अर्थ लिखे हैं। त्रुटियों को क्षमा करें और आवश्यकतानुरूप सुझाएँ।

Sunday, August 2, 2009

कबीर दोहा

निम्नांकित अर्थ मेरा अपनी मंद बुद्धि का समझा हुआ है। यदि यह ग़लत है, तो क्षमा करें और सही अर्थ सुझाएँ।

कबीर दास का यह दोहा जीवन के मोह के बारे में कहता है कि हमको जीवन के उतार चढाव में निर्भाव रहना चाहिए।

जाता है तो जान दे, तेरी दशा ना जाई।
केवटिया की नाव ज्यूँ, चढ़े मिलेंगे आई॥

अर्थ: कबीर दास कहते हैं..... जो जाता है उसको जाने देना चाहिए। व्यर्थ में अपनी दशा ख़राब नहीं करनी चाहिए। क्योंकि जिसको आना होता है, वो केवट की नाव चढ़कर आ जाता है। इस सन्दर्भ में कबीर दास भगवान् राम को ओर इशारा करते हैं, जो यमुना नदी के उस पार केवट की नाव पर चढ़ कर शबरी से मिलने पहुँच गए थे।

Tuesday, March 17, 2009

गुरु गुण

सब धरती कागद करे, लेखनी सब बनराय।
सात समुन्दर की मसि करे, गुरु गुण लिखा न जाय॥




















(May you turn all earth into reams of paper, forest into your pen; And the seven seas into your ink, Still the glory of a guru is hard to script.)
Pic: "Ram & Brothers in Gurukul" (Enjoy the lecture from Guru Vashisth here!!)

Saturday, February 23, 2008

Rahim on Love

'रहिमन' पैड़ा प्रेम को, निपट सिलसिली गैल।
बिलछत पांव पिपीलिको, लोग लदावत बैल॥


प्रेम की गली में कितनी ज्यादा फिसलन है! चींटी के भी पैर फिसल जाते हैं इस पर। और, हम लोगों को तो देखो, जो बैल लादकर चलने की सोचते है! (दुनिया भर का अहंकार सिर पर लादकर कोई कैसे प्रेम के विकट मार्ग पर चल सकता है? वह तो फिसलेगा ही।)

'रहिमन' प्रीति सराहिये, मिले होत रंग दून।
ज्यों जरदी हरदी तजै, तजै सफेदी चून॥

सराहना ऐसे ही प्रेम की की जाय जिसमें अन्तर न रह जाय। चूना और हल्दी मिलकर अपना-अपना रंग छोड़ देते है। (न दृष्टा रहता है और न दृश्य, दोनों एकाकार हो जाते हैं।)

कहा करौं वैकुण्ठ लै, कल्पबृच्छ की छांह।
'रहिमन' ढाक सुहावनो, जो गल पीतम-बाँह॥

वैकुण्ठ जाकर कल्पवृक्ष की छांहतले बैठने में रक्खा क्या है, यदि वहां प्रियतम पास न हो! उससे तो ढाक का पेड़ ही सुखदायक है, यदि उसकी छांह में प्रियतम के साथ गलबाँह देकर बैठने को मिले।

जे सुलगे ते बुझ गए, बुझे ते सुलगे नाहिं।
'रहिमन' दाहे प्रेम के, बुझि-बुझिकैं सुलगाहिं॥

आग में पड़कर लकड़ी सुलग-सुलगकर बुझ जाती है, बुझकर वह फिर सुलगती नहीं। लेकिन प्रेम की आग में दग्ध हो जाने वाले प्रेमीजन बुझकर भी सुलगते रहते है। (ऐसे प्रेमी ही असल में 'मरजीवा' हैं।)

यह न 'रहीम' सराहिये, देन-लेन की प्रीति।
प्रानन बाजी राखिये, हार होय कै जीत॥

ऐसे प्रेम को कौन सराहेगा, जिसमें लेन-देन का नाता जुड़ा हो! प्रेम क्या कोई खरीद-फरोख्त की चीज है? उसमें तो लगा दिया जाय प्राणों का दांव, परवा नहीं कि हार हो या जीत!

'रहिमन' मैन-तुरंग चढ़ि, चलिबो पावक माहिं।
प्रेम-पंथ ऐसो कठिन, सब कोउ निबहत नाहिं॥

प्रेम का मार्ग हर कोई नहीं तय कर सकता। बड़ा कठिन है उस पर चलना, जैसे मोम के बने घोड़े पर सवार हो आग (पावक) पर चलना।

- Dohas provided by unknown friend

Sunday, February 17, 2008

Melodies

1. Ramaiya Vasta Waiya - Shree 420
Listen to the song by clicking here.

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2. Bhula denge - Humko Deewana Kar Gaye
Lyrics are:
Abhi naaz hai toote dil ko wafa pe,

Ke tootenge saare bharam dheere dheere

Listen to the song by clicking here.
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3. Kabir Bhajans
ज्यों तिल माही तेल है, ज्यों चकमक में आग ।
तेरा साईं तुझमे है, तू जाग सके तो जाग ।।


जहाँ दया तहां धर्मं है, जहाँ लोभ वहाँ पाप ।
जहाँ क्रोध तहां काल है, जहाँ क्षमा वहाँ आप ।।

Listen to more bhajans by clicking at CD 1, CD 2, CD 3, CD 4, CD 5 and CD 6 here. Also, interesting is Kabir's life story at this link.
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Sunday, January 6, 2008

Few of my favorite dohas and quotations...

(This is an ever-growing list)

जाल परे जल जात बहि, तजि मीनन को मोह । 'रहिमन' मछरी नीर को तऊ न छाँड़ति छोह ।।
(Story of fish's unending love for water... Caught in a net, water leaves the fish leaving its attachment for the fish. But, rahim says, the fish gives up its life in the craving and separation with the water.)

टूटे सुजन मनाइए, जो टूटे सौ बार । 'रहिमन' फिर-फिर पोइए, टूटे मुक्ताहार ।।
(If your beloved gets angry with you, you should console him or her 100 times, just like we tie the garland of pearls as many times as it breaks.)

वहै प्रीत नहिं रीति वह, नहीं पाछिलो हेत । घटत-घटत 'रहिमन' घटै, ज्यों कर लीन्हे रेत ।।
(Rahim says, it’s not love, it’s tradition that diminishes with time. True love is not like the sand in our hands that slips away slowly from us. कर means hand in sanskrit.)

मीठा सब से बोलिए, फैले सुख चहुँ ओरे । वाशिकर्ण है मंत्र येही, तज दे वचन कठोर ।।
(Speak sweet with everyone because that spreads happiness. The only mantra to overpower others is to give up the harsh words.)

कबीरा तेरा झोंपड़ा गलकटियन के पास । अपनी करनी जांयगे, तू क्यूं हुआ उदास ।।
(Kabir says why do you worry even if you live near the butcher shop. He who does so will get accordingly.)

माटी कहे कुम्हार से तू क्यों रोंदे मोंहे । इक दिन ऐसा होवेगा मैं रोंदूंगी तोहें ।।
(Earth says to the potmaker, why do you knead me under your feet. There will come a day when I will knead you under me. This doha points to the eternal truth in death)

जे रहीम उत्तम प्रकृति, का करी सकत कुसंग । चन्दन वीष व्यापत नही, लिपटे रहत भुजुंग ।।
(Rahim says a person with good character does not get swayed in the bad company, just like the sandal tree does not get poisonous even when serpents hang around its trunk.

छमा बड़न को चाहिये, छोटन को उत्पात। कह रहीम हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात ।।
(It's required of elders to forgive when young ones do mischieves. Rahim says lord vishnu didn't lose anything even when maharishi bhrigu, brahma's son, kicked him in the chest. The lord even asked bhrigu if he had hurt his leg by kicking him. Vedic stories say bhrigu was testing who the greatest was among brahma, vishnu and mahesh by pushing their limits on anger. Since vishnu was asleep, bhrigu decided to wake him up through his kicks. This dohas says forgiving shows your greatness and high character.)

Other quotes

* "One can overcome the forces of negative emotions, like anger and hatred, by cultivating their counter-forces, like love and compassion." -- Dalai Lama

* "Love, joy, and peace cannot flourish until you have freed yourself from mind dominance." -- Eckhart Tolle

* "I do not believe that sheer suffering teaches. If suffering alone taught, all the world would be wise, since everyone suffers. To suffering must be added mourning, understanding, patience, love, openness and the willingness to remain vulnerable." -- Joseph Addison (1672-1719)


* "When you are sorrowful look again in your heart, and you shall see that in truth you are weeping for that which has been your delight." -- Kahlil Gibran