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Saturday, February 23, 2008
Rahim on Love
'रहिमन' पैड़ा प्रेम को, निपट सिलसिली गैल।
बिलछत पांव पिपीलिको, लोग लदावत बैल॥
प्रेम की गली में कितनी ज्यादा फिसलन है! चींटी के भी पैर फिसल जाते हैं इस पर। और, हम लोगों को तो देखो, जो बैल लादकर चलने की सोचते है! (दुनिया भर का अहंकार सिर पर लादकर कोई कैसे प्रेम के विकट मार्ग पर चल सकता है? वह तो फिसलेगा ही।)
'रहिमन' प्रीति सराहिये, मिले होत रंग दून।
ज्यों जरदी हरदी तजै, तजै सफेदी चून॥
सराहना ऐसे ही प्रेम की की जाय जिसमें अन्तर न रह जाय। चूना और हल्दी मिलकर अपना-अपना रंग छोड़ देते है। (न दृष्टा रहता है और न दृश्य, दोनों एकाकार हो जाते हैं।)
कहा करौं वैकुण्ठ लै, कल्पबृच्छ की छांह।
'रहिमन' ढाक सुहावनो, जो गल पीतम-बाँह॥
वैकुण्ठ जाकर कल्पवृक्ष की छांहतले बैठने में रक्खा क्या है, यदि वहां प्रियतम पास न हो! उससे तो ढाक का पेड़ ही सुखदायक है, यदि उसकी छांह में प्रियतम के साथ गलबाँह देकर बैठने को मिले।
जे सुलगे ते बुझ गए, बुझे ते सुलगे नाहिं।
'रहिमन' दाहे प्रेम के, बुझि-बुझिकैं सुलगाहिं॥
आग में पड़कर लकड़ी सुलग-सुलगकर बुझ जाती है, बुझकर वह फिर सुलगती नहीं। लेकिन प्रेम की आग में दग्ध हो जाने वाले प्रेमीजन बुझकर भी सुलगते रहते है। (ऐसे प्रेमी ही असल में 'मरजीवा' हैं।)
यह न 'रहीम' सराहिये, देन-लेन की प्रीति।
प्रानन बाजी राखिये, हार होय कै जीत॥
ऐसे प्रेम को कौन सराहेगा, जिसमें लेन-देन का नाता जुड़ा हो! प्रेम क्या कोई खरीद-फरोख्त की चीज है? उसमें तो लगा दिया जाय प्राणों का दांव, परवा नहीं कि हार हो या जीत!
'रहिमन' मैन-तुरंग चढ़ि, चलिबो पावक माहिं।
प्रेम-पंथ ऐसो कठिन, सब कोउ निबहत नाहिं॥
प्रेम का मार्ग हर कोई नहीं तय कर सकता। बड़ा कठिन है उस पर चलना, जैसे मोम के बने घोड़े पर सवार हो आग (पावक) पर चलना।
- Dohas provided by unknown friend
बिलछत पांव पिपीलिको, लोग लदावत बैल॥
प्रेम की गली में कितनी ज्यादा फिसलन है! चींटी के भी पैर फिसल जाते हैं इस पर। और, हम लोगों को तो देखो, जो बैल लादकर चलने की सोचते है! (दुनिया भर का अहंकार सिर पर लादकर कोई कैसे प्रेम के विकट मार्ग पर चल सकता है? वह तो फिसलेगा ही।)
'रहिमन' प्रीति सराहिये, मिले होत रंग दून।
ज्यों जरदी हरदी तजै, तजै सफेदी चून॥
सराहना ऐसे ही प्रेम की की जाय जिसमें अन्तर न रह जाय। चूना और हल्दी मिलकर अपना-अपना रंग छोड़ देते है। (न दृष्टा रहता है और न दृश्य, दोनों एकाकार हो जाते हैं।)
कहा करौं वैकुण्ठ लै, कल्पबृच्छ की छांह।
'रहिमन' ढाक सुहावनो, जो गल पीतम-बाँह॥
वैकुण्ठ जाकर कल्पवृक्ष की छांहतले बैठने में रक्खा क्या है, यदि वहां प्रियतम पास न हो! उससे तो ढाक का पेड़ ही सुखदायक है, यदि उसकी छांह में प्रियतम के साथ गलबाँह देकर बैठने को मिले।
जे सुलगे ते बुझ गए, बुझे ते सुलगे नाहिं।
'रहिमन' दाहे प्रेम के, बुझि-बुझिकैं सुलगाहिं॥
आग में पड़कर लकड़ी सुलग-सुलगकर बुझ जाती है, बुझकर वह फिर सुलगती नहीं। लेकिन प्रेम की आग में दग्ध हो जाने वाले प्रेमीजन बुझकर भी सुलगते रहते है। (ऐसे प्रेमी ही असल में 'मरजीवा' हैं।)
यह न 'रहीम' सराहिये, देन-लेन की प्रीति।
प्रानन बाजी राखिये, हार होय कै जीत॥
ऐसे प्रेम को कौन सराहेगा, जिसमें लेन-देन का नाता जुड़ा हो! प्रेम क्या कोई खरीद-फरोख्त की चीज है? उसमें तो लगा दिया जाय प्राणों का दांव, परवा नहीं कि हार हो या जीत!
'रहिमन' मैन-तुरंग चढ़ि, चलिबो पावक माहिं।
प्रेम-पंथ ऐसो कठिन, सब कोउ निबहत नाहिं॥
प्रेम का मार्ग हर कोई नहीं तय कर सकता। बड़ा कठिन है उस पर चलना, जैसे मोम के बने घोड़े पर सवार हो आग (पावक) पर चलना।
- Dohas provided by unknown friend
Friday, February 22, 2008
Rahim on life lessons
जैसी जाकी बुद्धि है, तैसी कहै बनाय।
ताको बुरो न मानिये, लेन कहां सूँ जाय॥
जिसकी जैसी जितनी बुद्धि होती है, वह वैसा ही बन जाता है, या बना-बना कर वैसी ही बात करता है। उसकी बात का इसलिए बुरा नहीं मानना चाहिए। कहां से वह सम्यक बुद्धि लेने जाय?
खरच बढ्यो उद्यम घट्यो, नृपति निठुर मन कीन।
कहु 'रहीम' कैसे जिए, थोरे जल की मीन॥
राजा भी निठुर बन गया, जबकि खर्च बेहद बढ़ गया और उद्यम मे कमी आ गयी। ऐसी दशा में जीना दूभर हो जाता है, जैसे जरा से जल में मछली का जीना।
खीरा को सिर काटिकै, मलियत लौन लगाय।
'रहिमन' करुवे मुखन की, चहिए यही सजाय॥
चलन है कि खीरे का ऊपरी सिरा काट कर उस पर नमक मल दिया जाता है। कड़ुवे वचन बोलनेवाले की यही सजा है।
सब कोऊ सबसों करें, राम जुहार सलाम।
हित अनहित तब जानिये, जा दिन अटके काम॥
आपस में मिलते हैं तो सभी सबसे राम-राम, सलाम और जुहार करते हैं। पर कौन मित्र है और कौन शत्रु, इसका पता तो काम पड़ने पर ही चलता है। तभी, जबकि किसीका कोई काम अटक जाता है।
'रहिमन' जिव्हा बावरी, कहिगी सरग पताल।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल॥
क्या किया जाय इस पगली जीभ का, जो न जाने क्या-क्या उल्टी-सीधी बातें स्वर्ग और पाताल तक की बक जाती है! खुद तो कहकर मुहँ के अन्दर हो जाती है, और बेचारे सिर को जूतियाँ खानी पड़ती है!
'रहिमन' तब लगि ठहरिए, दान, मान, सनमान।
घटत मान देखिय जबहिं, तुरतहि करिय पयान॥
तभी तक वहां रहा जाय, जब तक दान, मान और सम्मान मिले। जब देखने में आये कि मान-सम्मान घट रहा है, तो तत्काल वहां से चल देना चाहिए।
धन थोरो, इज्जत बड़ी, कहि 'रहीम' का बात।
जैसे कुल की कुलबधू, चिथड़न माहिं समात ॥
पैसा अगर थोडा है, पर इज्जत बड़ी है, तो यह कोइ निन्दनीय बात नहीं । खानदानी घर की स्त्री चिथड़े पहनकर भी अपने मान की रक्षा कर लेती हैं ।
अन्तर दावा लगि रहै, धुआं न प्रगटै सोय।
के जिय जाने आपनो, जा सिर बीती होय॥
आग अन्तर में सुलग रही है, पर उसका धुआं प्रकट नहीं हो रहा है। जिसके सिर पर बीतती है, उसीका जी उस आग को जानता है। कोई दूसरे उस आग का यानी दु:ख का मर्म समझ नहीं सकते।
कदली,सीप,भुजंग मुख, स्वाति एक गुन तीन।
जैसी संगति बैठिए, तैसोई फल दीन॥
स्वाती नक्षत्र की वर्षा की बूँद तो एक ही हैं, पर उसके गुण अलग-अलग तीन तरह के देखे जाते है ! कदली में पड़ने से, कहते है कि, उस बूंद का कपूर बन जाता है ! ओर,अगर सीप में वह पड़ी तो उसका मोती हो जाता है ! साप के मुहँ के में गिरने से उसी बूँद का विष बन जाता है ! जैसी संगत में बैठोगे, वेसा ही परिणाम उसका होगा ! (यह कवियों की मान्यता है, ओर इसे 'कवि समय' कहते है! )
काह कामरी पामड़ी, जाड़ गए से काज ।
'रहिमन' भूख बुताइए, कैस्यो मिले अनाज ॥
क्या तो कम्बल और क्या मखमल का कपड़ा ! असल में काम का तो वही है, जिससे कि जाड़ा चला जाय । खाने को चाहे जैसा अनाज मिल जाय, उससे भूख बुझनी चाहिए । (तुलसीदासजी ने भी यही बात कही है कि ;-
का भाषा, का संस्कृत, प्रेम चाहिए साँच ।
काम जो आवै कामरी, का लै करै कमाच ॥)
ससि संकोच, साहस, सलिल, मान, सनेह 'रहीम' ।
बढ़त-बढ़त बढ़ि जात है, घटत-घटत घटि सोम ॥
चन्द्रमा, संकोच, साहस, जल, सम्मान और स्नेह, ये सब ऐसे है, जो बढ़ते-बढ़ते बढ़ जाते हैं, और घटते-घटते घटने की सीमा को छू लेते हैं ।
जैसी परै सो सहि रहे , कहि 'रहीम' यह देह ।
धरती ही पर परग है , सीत, घाम औ' मेह ॥
जो कुछ भी इस देह पर आ बीते, वह सब सहन कर लेना चाहिए । जैसे, जाड़ा, धूप और वर्षा पड़ने पर धरती सहज ही सब सह लेती है । सहिष्णुता धरती का स्वाभाविक गुण है ।
जो बड़ेन को लघु कहै, नहिं 'रहीम' घटि जाहिं ।
गिरिधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाहिं ॥
बड़े को यदि कोई छोटा कह दे, तो उसका बड़प्पन कम नहीं हो जाता । गिरिधर श्रीकृष्ण को मुरलीधर कहने पर कहाँ बुरा मानते हैं ?
जो 'रहीम' मन हाथ है, तो तन कहुँ किन जाहि ।
जल में जो छाया परे ,काया भीजति नाहिं ॥
मन यदि अपने हाथ में है, अपने काबू में है, तो तन कहीं भी चला जाय, कुछ बिगड़ने का नहीं । जैसे काया भीगती नहीं है, जल में उसकी छाया पड़ने पर । [जीत और हार का कारण मन ही है, तन नहीं : 'मन के जीते जीत है, मन के हारे हार '।]
बड़े बड़ाई ना करैं , बड़ो न बोले बोल ।
'रहिमन' हीरा कब कहै, लाख टका मम मोल ॥
जो सचमुच बड़े होते हैं, वे अपनी बड़ाई नहीं किया करते, बड़े-बड़े बोल नहीं बोला करते । हीरा कब कहता है कि मेरा मोल लाख टके का है । [छोटे छिछोरे आदमी ही बातें बना-बनाकर अपनी तारीफ के पुल बाँधा करते हैं ।]
भार झोंकि कै भार में, 'रहिमन' उतरे पार ।
पै बूड़े मँझधार में , जिनके सिर पर भार ॥
अहम् को यानी खुदी के भार को भाड़ में झोंककर हम तो पार उतर गये । बीच धार में तो वे ही डूबे, जिनके सिर पर अहंकार का भार रखा हुआ था, या जिन्होंने स्वयं भार रख लिया था ।
यह 'रहीम' निज संग लै, जनमत जगत न कोय ।
बैर, प्रीति, अभ्यास, जस होत होत ही होय ॥
बैर, प्रीति, अभ्यास और यश इनके साथ संसार में कोई भी जन्म नहीं लेता । ये सारी चीजें तो धीरे-धीरे ही आती हैं ।
यों 'रहीम' सुख दुख सहत , बड़े लोग सह सांति ।
उवत चंद जेहिं भाँति सों , अथवत ताही भाँति ॥
बड़े आदमी शान्तिपूर्वक सुख और दुःख को सह लेते हैं । वे न सुख पाकर फूल जाते हैं और न दुःख में घबराते हैं । चन्द्रमा जिस प्रकार उदित होता है, उसी प्रकार डूब भी जाता है ।
'रहिमन' चुप ह्वै बैठिए, देखि दिनन को फेर ।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर ॥
यह देखकर कि बुरे दिन आगये, चुप बैठ जाना चाहिए । दुर्भाग्य की शिकायत क्यों और किस से की जाय ? जब अच्छे दिन फिरेंगे, तो बनने में देर नहीं लगेगी । इस विश्वास का सहारा लेकर तुम चुपचाप बैठे रहो ।
'रहिमन' तीन प्रकार ते, हित अनहित पहिचानि ।
पर-बस परे, परोस-बस, परे मामिला जानि ॥
क्या तो हित है और क्या अनहित, इसकी पहचान तीन प्रकार से होती है: दूसरे के बस में होने से, पड़ोस में रहने से और मामला मुकदमा पड़ने पर ।
'रहिमन' निज मन की बिथा, मनही राखो गोय ।
सुनि अठिलैहैं लोग सब , बाँटि न लैहैं कोय ॥
अन्दर के दुःख को अन्दर ही छिपाकर रख लेना चाहिए, उसे सुनकर लोग उल्टे हँसी करेंगे कोई भी दुःख को बाँट नहीं लेगा ।
'रहिमन' मनहिं लगाईके, देखि लेहु किन कोय ।
नर को बस करिबो कहा, नारायन बस होय ॥
मन को स्थिर करके कोई क्यों नहीं देख लेता, इस परम सत्य को कि, मनुष्य को वश में कर लेना तो बात ही क्या, नारायण भी वश में हो जाते हैं ।
'रहिमन' मारग प्रेम को, मत मतिहीन मझाव ।
जो डिगहै तो फिर कहूँ, नहिं धरने को पाँव ॥
हाँ, यह मार्ग प्रेम का मार्ग है । कोई नासमझ इस पर पैर न रखे । यदि डगमगा गये तो, फिर कहीं पैर धरने की जगह नहीं । मतलब यह कि बहुत समझ-बूझकर और धीरज और दृढ़ता के साथ प्रेम के मार्ग पर पैर रखना चाहिए ।
'रहिमन' रिस को छाँड़ि के, करौ गरीबी भेस ।
मीठो बोलो, नै चलो, सबै तुम्हारी देस ॥
क्रोध को छोड़ दो और गरीबों की रहनी रहो । मीठे वचन बोलो और नम्रता से चलो, अकड़कर नहीं । फिर तो सारा ही देश तुम्हारा है ।
राम न जाते हरिन संग, सीय न रावन-साथ ।
जो 'रहीम' भावी कतहुँ, होत आपने हाथ ॥
होनहार (या 'होनी') यदि अपने हाथ में होती, उस पर अपना वश चलता, तो माया-मृग के पीछे राम क्यों दौड़ते, और रावण क्यों सीता को हर ले जाता !
स्वासह तुरिय जो उच्चरे, तिय है निहचल चित्त ।
पूरा परा घर जानिए, 'रहिमन' तीन पवित्त ॥
ये तीनों परम पवित्र हैं :- वह स्वास, जिसे खींचकर योगी त्वरीया अवस्था का अनुभव करता है, वह स्त्री, जिसका चित्त पतिव्रत में निश्चल हो गया है, पर पुरुष को देखकर जिसका मन चंचल नहीं होता । और सुपुत्र,[जो अपने चरित्र से कुल का दीपक बन जाता है।]
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ताको बुरो न मानिये, लेन कहां सूँ जाय॥
जिसकी जैसी जितनी बुद्धि होती है, वह वैसा ही बन जाता है, या बना-बना कर वैसी ही बात करता है। उसकी बात का इसलिए बुरा नहीं मानना चाहिए। कहां से वह सम्यक बुद्धि लेने जाय?
खरच बढ्यो उद्यम घट्यो, नृपति निठुर मन कीन।
कहु 'रहीम' कैसे जिए, थोरे जल की मीन॥
राजा भी निठुर बन गया, जबकि खर्च बेहद बढ़ गया और उद्यम मे कमी आ गयी। ऐसी दशा में जीना दूभर हो जाता है, जैसे जरा से जल में मछली का जीना।
खीरा को सिर काटिकै, मलियत लौन लगाय।
'रहिमन' करुवे मुखन की, चहिए यही सजाय॥
चलन है कि खीरे का ऊपरी सिरा काट कर उस पर नमक मल दिया जाता है। कड़ुवे वचन बोलनेवाले की यही सजा है।
सब कोऊ सबसों करें, राम जुहार सलाम।
हित अनहित तब जानिये, जा दिन अटके काम॥
आपस में मिलते हैं तो सभी सबसे राम-राम, सलाम और जुहार करते हैं। पर कौन मित्र है और कौन शत्रु, इसका पता तो काम पड़ने पर ही चलता है। तभी, जबकि किसीका कोई काम अटक जाता है।
'रहिमन' जिव्हा बावरी, कहिगी सरग पताल।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल॥
क्या किया जाय इस पगली जीभ का, जो न जाने क्या-क्या उल्टी-सीधी बातें स्वर्ग और पाताल तक की बक जाती है! खुद तो कहकर मुहँ के अन्दर हो जाती है, और बेचारे सिर को जूतियाँ खानी पड़ती है!
'रहिमन' तब लगि ठहरिए, दान, मान, सनमान।
घटत मान देखिय जबहिं, तुरतहि करिय पयान॥
तभी तक वहां रहा जाय, जब तक दान, मान और सम्मान मिले। जब देखने में आये कि मान-सम्मान घट रहा है, तो तत्काल वहां से चल देना चाहिए।
धन थोरो, इज्जत बड़ी, कहि 'रहीम' का बात।
जैसे कुल की कुलबधू, चिथड़न माहिं समात ॥
पैसा अगर थोडा है, पर इज्जत बड़ी है, तो यह कोइ निन्दनीय बात नहीं । खानदानी घर की स्त्री चिथड़े पहनकर भी अपने मान की रक्षा कर लेती हैं ।
अन्तर दावा लगि रहै, धुआं न प्रगटै सोय।
के जिय जाने आपनो, जा सिर बीती होय॥
आग अन्तर में सुलग रही है, पर उसका धुआं प्रकट नहीं हो रहा है। जिसके सिर पर बीतती है, उसीका जी उस आग को जानता है। कोई दूसरे उस आग का यानी दु:ख का मर्म समझ नहीं सकते।
कदली,सीप,भुजंग मुख, स्वाति एक गुन तीन।
जैसी संगति बैठिए, तैसोई फल दीन॥
स्वाती नक्षत्र की वर्षा की बूँद तो एक ही हैं, पर उसके गुण अलग-अलग तीन तरह के देखे जाते है ! कदली में पड़ने से, कहते है कि, उस बूंद का कपूर बन जाता है ! ओर,अगर सीप में वह पड़ी तो उसका मोती हो जाता है ! साप के मुहँ के में गिरने से उसी बूँद का विष बन जाता है ! जैसी संगत में बैठोगे, वेसा ही परिणाम उसका होगा ! (यह कवियों की मान्यता है, ओर इसे 'कवि समय' कहते है! )
काह कामरी पामड़ी, जाड़ गए से काज ।
'रहिमन' भूख बुताइए, कैस्यो मिले अनाज ॥
क्या तो कम्बल और क्या मखमल का कपड़ा ! असल में काम का तो वही है, जिससे कि जाड़ा चला जाय । खाने को चाहे जैसा अनाज मिल जाय, उससे भूख बुझनी चाहिए । (तुलसीदासजी ने भी यही बात कही है कि ;-
का भाषा, का संस्कृत, प्रेम चाहिए साँच ।
काम जो आवै कामरी, का लै करै कमाच ॥)
ससि संकोच, साहस, सलिल, मान, सनेह 'रहीम' ।
बढ़त-बढ़त बढ़ि जात है, घटत-घटत घटि सोम ॥
चन्द्रमा, संकोच, साहस, जल, सम्मान और स्नेह, ये सब ऐसे है, जो बढ़ते-बढ़ते बढ़ जाते हैं, और घटते-घटते घटने की सीमा को छू लेते हैं ।
जैसी परै सो सहि रहे , कहि 'रहीम' यह देह ।
धरती ही पर परग है , सीत, घाम औ' मेह ॥
जो कुछ भी इस देह पर आ बीते, वह सब सहन कर लेना चाहिए । जैसे, जाड़ा, धूप और वर्षा पड़ने पर धरती सहज ही सब सह लेती है । सहिष्णुता धरती का स्वाभाविक गुण है ।
जो बड़ेन को लघु कहै, नहिं 'रहीम' घटि जाहिं ।
गिरिधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाहिं ॥
बड़े को यदि कोई छोटा कह दे, तो उसका बड़प्पन कम नहीं हो जाता । गिरिधर श्रीकृष्ण को मुरलीधर कहने पर कहाँ बुरा मानते हैं ?
जो 'रहीम' मन हाथ है, तो तन कहुँ किन जाहि ।
जल में जो छाया परे ,काया भीजति नाहिं ॥
मन यदि अपने हाथ में है, अपने काबू में है, तो तन कहीं भी चला जाय, कुछ बिगड़ने का नहीं । जैसे काया भीगती नहीं है, जल में उसकी छाया पड़ने पर । [जीत और हार का कारण मन ही है, तन नहीं : 'मन के जीते जीत है, मन के हारे हार '।]
बड़े बड़ाई ना करैं , बड़ो न बोले बोल ।
'रहिमन' हीरा कब कहै, लाख टका मम मोल ॥
जो सचमुच बड़े होते हैं, वे अपनी बड़ाई नहीं किया करते, बड़े-बड़े बोल नहीं बोला करते । हीरा कब कहता है कि मेरा मोल लाख टके का है । [छोटे छिछोरे आदमी ही बातें बना-बनाकर अपनी तारीफ के पुल बाँधा करते हैं ।]
भार झोंकि कै भार में, 'रहिमन' उतरे पार ।
पै बूड़े मँझधार में , जिनके सिर पर भार ॥
अहम् को यानी खुदी के भार को भाड़ में झोंककर हम तो पार उतर गये । बीच धार में तो वे ही डूबे, जिनके सिर पर अहंकार का भार रखा हुआ था, या जिन्होंने स्वयं भार रख लिया था ।
यह 'रहीम' निज संग लै, जनमत जगत न कोय ।
बैर, प्रीति, अभ्यास, जस होत होत ही होय ॥
बैर, प्रीति, अभ्यास और यश इनके साथ संसार में कोई भी जन्म नहीं लेता । ये सारी चीजें तो धीरे-धीरे ही आती हैं ।
यों 'रहीम' सुख दुख सहत , बड़े लोग सह सांति ।
उवत चंद जेहिं भाँति सों , अथवत ताही भाँति ॥
बड़े आदमी शान्तिपूर्वक सुख और दुःख को सह लेते हैं । वे न सुख पाकर फूल जाते हैं और न दुःख में घबराते हैं । चन्द्रमा जिस प्रकार उदित होता है, उसी प्रकार डूब भी जाता है ।
'रहिमन' चुप ह्वै बैठिए, देखि दिनन को फेर ।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर ॥
यह देखकर कि बुरे दिन आगये, चुप बैठ जाना चाहिए । दुर्भाग्य की शिकायत क्यों और किस से की जाय ? जब अच्छे दिन फिरेंगे, तो बनने में देर नहीं लगेगी । इस विश्वास का सहारा लेकर तुम चुपचाप बैठे रहो ।
'रहिमन' तीन प्रकार ते, हित अनहित पहिचानि ।
पर-बस परे, परोस-बस, परे मामिला जानि ॥
क्या तो हित है और क्या अनहित, इसकी पहचान तीन प्रकार से होती है: दूसरे के बस में होने से, पड़ोस में रहने से और मामला मुकदमा पड़ने पर ।
'रहिमन' निज मन की बिथा, मनही राखो गोय ।
सुनि अठिलैहैं लोग सब , बाँटि न लैहैं कोय ॥
अन्दर के दुःख को अन्दर ही छिपाकर रख लेना चाहिए, उसे सुनकर लोग उल्टे हँसी करेंगे कोई भी दुःख को बाँट नहीं लेगा ।
'रहिमन' मनहिं लगाईके, देखि लेहु किन कोय ।
नर को बस करिबो कहा, नारायन बस होय ॥
मन को स्थिर करके कोई क्यों नहीं देख लेता, इस परम सत्य को कि, मनुष्य को वश में कर लेना तो बात ही क्या, नारायण भी वश में हो जाते हैं ।
'रहिमन' मारग प्रेम को, मत मतिहीन मझाव ।
जो डिगहै तो फिर कहूँ, नहिं धरने को पाँव ॥
हाँ, यह मार्ग प्रेम का मार्ग है । कोई नासमझ इस पर पैर न रखे । यदि डगमगा गये तो, फिर कहीं पैर धरने की जगह नहीं । मतलब यह कि बहुत समझ-बूझकर और धीरज और दृढ़ता के साथ प्रेम के मार्ग पर पैर रखना चाहिए ।
'रहिमन' रिस को छाँड़ि के, करौ गरीबी भेस ।
मीठो बोलो, नै चलो, सबै तुम्हारी देस ॥
क्रोध को छोड़ दो और गरीबों की रहनी रहो । मीठे वचन बोलो और नम्रता से चलो, अकड़कर नहीं । फिर तो सारा ही देश तुम्हारा है ।
राम न जाते हरिन संग, सीय न रावन-साथ ।
जो 'रहीम' भावी कतहुँ, होत आपने हाथ ॥
होनहार (या 'होनी') यदि अपने हाथ में होती, उस पर अपना वश चलता, तो माया-मृग के पीछे राम क्यों दौड़ते, और रावण क्यों सीता को हर ले जाता !
स्वासह तुरिय जो उच्चरे, तिय है निहचल चित्त ।
पूरा परा घर जानिए, 'रहिमन' तीन पवित्त ॥
ये तीनों परम पवित्र हैं :- वह स्वास, जिसे खींचकर योगी त्वरीया अवस्था का अनुभव करता है, वह स्त्री, जिसका चित्त पतिव्रत में निश्चल हो गया है, पर पुरुष को देखकर जिसका मन चंचल नहीं होता । और सुपुत्र,[जो अपने चरित्र से कुल का दीपक बन जाता है।]
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Sunday, January 6, 2008
Few of my favorite dohas and quotations...
(This is an ever-growing list)
जाल परे जल जात बहि, तजि मीनन को मोह । 'रहिमन' मछरी नीर को तऊ न छाँड़ति छोह ।।
(Story of fish's unending love for water... Caught in a net, water leaves the fish leaving its attachment for the fish. But, rahim says, the fish gives up its life in the craving and separation with the water.)
टूटे सुजन मनाइए, जो टूटे सौ बार । 'रहिमन' फिर-फिर पोइए, टूटे मुक्ताहार ।।
(If your beloved gets angry with you, you should console him or her 100 times, just like we tie the garland of pearls as many times as it breaks.)
वहै प्रीत नहिं रीति वह, नहीं पाछिलो हेत । घटत-घटत 'रहिमन' घटै, ज्यों कर लीन्हे रेत ।।
(Rahim says, it’s not love, it’s tradition that diminishes with time. True love is not like the sand in our hands that slips away slowly from us. कर means hand in sanskrit.)
मीठा सब से बोलिए, फैले सुख चहुँ ओरे । वाशिकर्ण है मंत्र येही, तज दे वचन कठोर ।।
(Speak sweet with everyone because that spreads happiness. The only mantra to overpower others is to give up the harsh words.)
कबीरा तेरा झोंपड़ा गलकटियन के पास । अपनी करनी जांयगे, तू क्यूं हुआ उदास ।।
(Kabir says why do you worry even if you live near the butcher shop. He who does so will get accordingly.)
माटी कहे कुम्हार से तू क्यों रोंदे मोंहे । इक दिन ऐसा होवेगा मैं रोंदूंगी तोहें ।।
(Earth says to the potmaker, why do you knead me under your feet. There will come a day when I will knead you under me. This doha points to the eternal truth in death)
जे रहीम उत्तम प्रकृति, का करी सकत कुसंग । चन्दन वीष व्यापत नही, लिपटे रहत भुजुंग ।।
(Rahim says a person with good character does not get swayed in the bad company, just like the sandal tree does not get poisonous even when serpents hang around its trunk.
छमा बड़न को चाहिये, छोटन को उत्पात। कह रहीम हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात ।।
(It's required of elders to forgive when young ones do mischieves. Rahim says lord vishnu didn't lose anything even when maharishi bhrigu, brahma's son, kicked him in the chest. The lord even asked bhrigu if he had hurt his leg by kicking him. Vedic stories say bhrigu was testing who the greatest was among brahma, vishnu and mahesh by pushing their limits on anger. Since vishnu was asleep, bhrigu decided to wake him up through his kicks. This dohas says forgiving shows your greatness and high character.)
जाल परे जल जात बहि, तजि मीनन को मोह । 'रहिमन' मछरी नीर को तऊ न छाँड़ति छोह ।।
(Story of fish's unending love for water... Caught in a net, water leaves the fish leaving its attachment for the fish. But, rahim says, the fish gives up its life in the craving and separation with the water.)
टूटे सुजन मनाइए, जो टूटे सौ बार । 'रहिमन' फिर-फिर पोइए, टूटे मुक्ताहार ।।
(If your beloved gets angry with you, you should console him or her 100 times, just like we tie the garland of pearls as many times as it breaks.)
वहै प्रीत नहिं रीति वह, नहीं पाछिलो हेत । घटत-घटत 'रहिमन' घटै, ज्यों कर लीन्हे रेत ।।
(Rahim says, it’s not love, it’s tradition that diminishes with time. True love is not like the sand in our hands that slips away slowly from us. कर means hand in sanskrit.)
मीठा सब से बोलिए, फैले सुख चहुँ ओरे । वाशिकर्ण है मंत्र येही, तज दे वचन कठोर ।।
(Speak sweet with everyone because that spreads happiness. The only mantra to overpower others is to give up the harsh words.)
कबीरा तेरा झोंपड़ा गलकटियन के पास । अपनी करनी जांयगे, तू क्यूं हुआ उदास ।।
(Kabir says why do you worry even if you live near the butcher shop. He who does so will get accordingly.)
माटी कहे कुम्हार से तू क्यों रोंदे मोंहे । इक दिन ऐसा होवेगा मैं रोंदूंगी तोहें ।।
(Earth says to the potmaker, why do you knead me under your feet. There will come a day when I will knead you under me. This doha points to the eternal truth in death)
जे रहीम उत्तम प्रकृति, का करी सकत कुसंग । चन्दन वीष व्यापत नही, लिपटे रहत भुजुंग ।।
(Rahim says a person with good character does not get swayed in the bad company, just like the sandal tree does not get poisonous even when serpents hang around its trunk.
छमा बड़न को चाहिये, छोटन को उत्पात। कह रहीम हरि का घट्यौ, जो भृगु मारी लात ।।
(It's required of elders to forgive when young ones do mischieves. Rahim says lord vishnu didn't lose anything even when maharishi bhrigu, brahma's son, kicked him in the chest. The lord even asked bhrigu if he had hurt his leg by kicking him. Vedic stories say bhrigu was testing who the greatest was among brahma, vishnu and mahesh by pushing their limits on anger. Since vishnu was asleep, bhrigu decided to wake him up through his kicks. This dohas says forgiving shows your greatness and high character.)
Other quotes
* "One can overcome the forces of negative emotions, like anger and hatred, by cultivating their counter-forces, like love and compassion." -- Dalai Lama
* "Love, joy, and peace cannot flourish until you have freed yourself from mind dominance." -- Eckhart Tolle
* "I do not believe that sheer suffering teaches. If suffering alone taught, all the world would be wise, since everyone suffers. To suffering must be added mourning, understanding, patience, love, openness and the willingness to remain vulnerable." -- Joseph Addison (1672-1719)
* "When you are sorrowful look again in your heart, and you shall see that in truth you are weeping for that which has been your delight." -- Kahlil Gibran
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