Thursday, October 22, 2009

वाणी का जादू

केवल मनुष्य ही एक ऐसा जीव है, जिसे भगवान ने वाणी को मन मुताबिक ढालने का वरदान दिया है। वाणी हमारे विचारों को पवित्र और दूषित भी कर सकती है। इसलिए इस वाणी के उपहार का सदुपयोग करने का सुझाव बहुत से संतों ने दिया है...

राम नाम मनि दीप धरु, जीह देहरी द्वार।
तुलसी भीतर बाहिरौ जौ चाहसि उजियार॥

तुलसी दास जी कहते हैं... जीभ ऐसी दरवाजे की देहरी है जहाँ पर राम नाम का "मणि दीप" रख देने से बाहर और भीतर दोनों का अँधेरा मिट जाता है और इस तरह जहाँ भी चाहो, वहां उजाला हो जाता है। इसका अर्थ वाणी की सच्चाई, सफाई, मधुरता और राम नाम के ध्यान और जाप से तो है ही, बल्कि ऐसा दीप रख पाने के मन के संकल्प और साहस से भी है।

ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय॥

कबीर दास जी कहते हैं... मन के अहंभाव को खोकर ऐसी वाणी बोलनी चाहिए कि अपने को तो शान्ति मिले ही, दूसरे भी प्रसन्न हो जाएँ।

Thursday, October 15, 2009

परम सत्य

ज्यादातर लोगों के लिए सच का मतलब सिर्फ़ सच बोलने में ही होता है। लेकिन असली सच का मतलब होता है... मन, कर्म और वचन का सत्य । इन तीनों के मेल से जो सत्य आता है, वही परम सत्य है। किंतु यह सत्य धर्मानुसार ही होना चाहिए।

यदि इन तीनों का मेल किसी सत्य में नहीं होता है, तो उस सत्य में विकार हो सकते हैं। जैसे...
ईर्ष्या/छल -- मन में कोई भावना, किंतु वचन में कुछ और
ढोंग/पाखंड/छल -- कहनी कुछ, किंतु करनी कुछ और
अहंकार/हठ -- मन के विवेक में कुछ, किंतु कर्म में कुछ और

जब हम परम सत्य नहीं बोलते या नहीं बोल पाते, तब यही विकार हमारे व्यवहार में आ जाते हैं। इस बात को जान लेने और ध्यान में रखने से ही हम अपने व्यवहार की जटिलता को समझ सकते हैं। परम सत्य को अपनाना कठिन जरुर होता है और तप करना पड़ता है, लेकिन इससे आपको हमेशा शान्ति और सुख का अनुभव होता रहेगा। जैसा कि अंग्रेज़ी में भी कहते हैं... "The Truth will set you free"

इसका मतलब यही है कि सत्य और सिर्फ़ परम सत्य ही मन, कर्म और वाणी के इस अनुपम तालमेल से आपके व्यक्तित्व और व्यवहार की बहुत से विकारों (या व्याधियों) को दूर कर सकता है।

पाँच उपाय

यह आचार्य अनिरुद्ध जी का लेख यहाँ पर उपलब्ध है... सारांश में इन्होंने बहुत अच्छे ५ उपाय बताये हैं।

भागदौड़ भरी जीवन शैली के चलते मनुष्य ने प्रकृति और स्वयं का सान्निध्य खो दिया है। इसी वजह से जीवन में कई तरह के रोग और शोक जन्म लेते हैं। हमारे पास नियमित रूप से योग करने या स्वस्थ रहने के अन्य कोई उपाय करने का समय भी नहीं है। यही सोचकर हम आपके लिए लाए हैं योग के यम, नियम और आसन में से कुछ ऐसे उपाय, जिनके जरिए आप फटाफट योग कर शरीर और मन को सेहतमंद रख सकते हैं।

(1) संयम ही तप है: संयम एक ऐसा शब्द है, जिसके आगे पदार्थ या परमाणुओं की नहीं चलती। ठेठ भाषा में कहें तो ठान लेना, जिद करना या हठ करना। यदि तुम व्यसन करते हो और संयम नहीं है तो मरते दम तक उसे नहीं छोड़ पाओगे। इसी तरह गुस्सा करने या ज्यादा बोलने की आदत भी होती है।

संयम की शुरुआत आप छोटे-छोटे संकल्प से कर सकते हैं। संकल्प लें कि आज से मैं वहीं करूँगा, जो मैं चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ खुश रहना, स्वस्थ रहना और सर्वाधिक योग्य होना। व्रत से भी संयम साधा जा सकता है। आहार-विहार, निंद्रा-जाग्रति और मौन तथा जरूरत से ज्यादा बोलने की स्थिति में संयम से ही स्वास्थ्य तथा मोक्ष घटित होता है। संयम नहीं है तो यम, नियम, आसन आदि सभी व्यर्थ सिद्ध होते हैं।

(2) ईश्वर प्रणिधान: एकेश्वरवादी न भी हों तो भी जीवनपर्यंत किसी एक पर चित्त को लगाकर उसी के प्रति समर्पित रहने से चित्त संकल्पवान, धारणा सम्पन्न तथा निर्भीक होने लगता है। यह जीवन की सफलता हेतु अत्यंत आवश्यक है। जो व्यक्ति ग्रह-नक्षत्र, असंख्‍य देवी-देवता, तंत्र-मंत्र और तरह-तरह के अंधविश्वासों पर विश्वास करता है, उसका संपूर्ण जीवन भ्रम, भटकाव और विरोधाभासों में ही बीत जाता है। इससे निर्णयहीनता का जन्म होता है।

(3) अंग-संचालन: अंग-संचालन को सूक्ष्म व्यायाम भी कहते हैं। इसे आसनों की शुरुआत के पूर्व किया जाता है। इससे शरीर आसन करने लायक तैयार हो जाता है। सूक्ष्म व्यायाम के अंतर्गत नेत्र, गर्दन, कंधे, हाथ-पैरों की एड़ी-पंजे, घुटने, नितंब-कुल्हों आदि सभी की बेहतर वर्जिश होती है, जो हम थोड़े से समय में ही कर सकते है। इसके लिए किसी अतिरिक्त समय की आवश्यकता नहीं होती। आप किसी योग शिक्षक से अंग-संचालन सीखकर उसे घर या ऑफिस में कहीं भी कर सकते हैं।

(4) प्राणायाम: अंग-संचालन करते हुए यदि आप इसमें अनुलोम-विलोम प्राणायाम भी जोड़ देते हैं तो यह एक तरह से आपके भीतर के अंगों और सूक्ष्म नाड़ियों को शुद्ध-पुष्ट कर देगा। जब भी मौका मिले, प्राणायाम को अच्छे से सीखकर करें।

(5) ध्यान: ध्यान के बारे में भी आजकल सभी जानने लगे हैं। ध्यान हमारी ऊर्जा को फिर से संचित करने का कार्य करता है, इसलिए सिर्फ पाँच मिनट का ध्यान आप कहीं भी कर सकते हैं। खासकर सोते और उठते समय इसे बिस्तर पर ही किसी भी सुखासन में किया जा सकता है।

उपरोक्त पाँच उपाय आपके जीवन को बदलने की क्षमता रखते हैं, बशर्ते आप इन्हें ईमानदारी से नियमित करें।


बाकी योग पर अच्छे लेख भी पढ़िये... वेबदुनिया के आलेखों में

Sunday, October 11, 2009

होनहार बिरवान के होत चीकने पात

इस कहावत पर प्रेमचंद जी ने एक साहित्यिक नाटक लिखा है। इस कहावत का अर्थ है कि जो होनहार (प्रतिभाशाली) लोग होते हैं, उनके ढंग और गुण ही निराले होते हैं। वह मामूली लोगों से अपनी सोच के बल से अलग दिखते हैं।
(बिरवान = पेड़, पात = पत्ते)

यहाँ पढिये... प्रेमचंद का जीवन परिचय (सारांश)
एवं हिन्दी के अन्य कवि और लेखक

Friday, October 2, 2009

A Tribute to Gandhi ji on His Birthday...

"Be a Vegetarian"

As Bapu was. He writes in his autobiography, The Story of My Experiments with Truth...

"There are many causes that I am prepared to die for but no causes that I am prepared to kill for."

Albert Einstein once said of Mahatma, "Generations to come will scarce believe that such a one as this walked the earth in flesh and blood."