Monday, December 8, 2014

गीता जयंती

श्री गीता जयंती जी के इस पुण्य अवसर पर.…

श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय के तीसवें श्लोक में भगवान कहते हैं.…

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥ ३० ॥

जो मुझे सर्वत्र देखता है (अर्थात हर एक कण में मेरे व्याप्त होने के रहस्य को जानता है) और मुझमें समस्त सृष्टि को देखता है(अर्थात यह जानता है कि सम्पूर्ण सृष्टि मुझमें स्थित है), मैं उसकी दृष्टि से दूर नहीं होता और न ही वह मेरी दृष्टि से दूर होता है।

यही ज्ञान मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम माता शबरी को नवधा भक्ति के रूप में देते हैं और कहते हैं कि भक्ति का सातवाँ प्रकार सारे जगत को राममय देखने में है .…

सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा।।     (अरण्यकाण्ड)

भौतिक जीवन में यह करने में जब कठिन हो जाता है, इन प्रभु ज्ञान पंक्तियों को जो लोग मन में रखते हैं, भगवान उनका पग पग पर मार्ग दर्शन करते रहते हैं।   जब आपका विश्वास भगवान पर और दृढ एवं अटल हो जाएगा, तब आप स्वयं ही निर्भय हो जाएंगे।
 

Tuesday, November 25, 2014

प्रभु लीला

प्रभु श्री राम स्वयं ही परम ब्रह्म हैं।  श्री भागवत महापुराण के प्रथम स्कंध के दूसरे अध्याय में यह स्पष्ट है कि त्रिगुणी प्रकृति से इस संसार की स्थिति, उत्पति और प्रलय के लिए यही ब्रह्म (परमात्मा) ही विष्णु, ब्रह्मा और रूद्र रूप ग्रहण करते हैं।  इसलिए श्रीराम को बस अवतार न समझ कर उन प्रभु में निर्गुण ब्रह्म को ही देखिए और भक्ति को उस ब्रह्म के साक्षात्कार का साधन। 

आगे लिखा है कि धर्म के ठीक-ठीक अनुष्ठान करने पर भी यदि ह्रदय में भगवान की लीला-कथाओं में अनुराग का उदय न हो, तो वह निरा कर्म ही है।  आतम ज्ञान बिना नर भटके, कभी मथुरा, कभी काशी।  परमात्मा आपके ह्रदय में ही हैं।  सच्ची भक्ति वही है जिससे ज्ञान और वैराग्य का उदय हो।  ज्ञान भगवान को तत्व से जानने को कहते हैं और वैराग्य आसक्ति के हटने को।   तत्व से जानना अर्थात उनकी कृपा को बहुत कृतज्ञता से देखना और इस जीवन को अंत न समझ लेना।  जीवन के कर्म करते हुए भी फल में आसक्ति का न होना। जो प्रभु दें, उसको सहर्ष स्वीकार करना।  मोह ही अज्ञान है।   मोह सकल ब्याधिन के मूला, तिन्हते पुनि उपजहिं बहु सूला।  इसलिए भक्ति से ज्ञान और ज्ञान से प्रभु में विश्वास अधिक दृढ होना चाहिए। 

तुलसीदास जी उनकी लीला का सुन्दर वर्णन करते हैं...

प्रेम मगन कौसल्या निसिदिन जात न जान।
सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान।।  (बालकाण्ड दो० २००)
प्रेम में मग्न कौसल्याजी रात और दिन का बीतना नहीं जानती थीं। पुत्र के स्नेहवश माता उनके बालचरित्रों का गान किया करतीं।।

एक बार जननीं अन्हवाए। करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाए।।
निज कुल इष्टदेव भगवाना। पूजा हेतु कीन्ह अस्नाना।।
एक बार माता ने श्री रामचन्द्रजी को स्नान कराया और श्रृंगार करके पालने पर पौढ़ा दिया। फिर अपने कुल के इष्टदेव भगवान की पूजा के लिए स्नान किया।।
 
करि पूजा नैबेद्य चढ़ावा। आपु गई जहँ पाक बनावा।।
बहुरि मातु तहवाँ चलि आई। भोजन करत देख सुत जाई।।
पूजा करके नैवेद्य चढ़ाया और स्वयं वहाँ गईं, जहाँ रसोई बनाई गई थी। फिर माता वहीं (पूजा के स्थान में) लौट आई और वहाँ आने पर पुत्र को (इष्टदेव भगवान के लिए चढ़ाए हुए नैवेद्य का) भोजन करते देखा।।
 
गै जननी सिसु पहिं भयभीता। देखा बाल तहाँ पुनि सूता।।
बहुरि आइ देखा सुत सोई। हृदयँ कंप मन धीर न होई।।
माता भयभीत होकर (पालने में सोया था, यहाँ किसने लाकर बैठा दिया, इस बात से डरकर) पुत्र के पास गई, तो वहाँ बालक को सोया हुआ देखा। फिर (पूजा स्थान में लौटकर) देखा कि वही पुत्र वहाँ (भोजन कर रहा) है। उनके हृदय में कम्प होने लगा और मन को धीरज नहीं होता।।
 
इहाँ उहाँ दुइ बालक देखा। मतिभ्रम मोर कि आन बिसेषा।।
देखि राम जननी अकुलानी। प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुसुकानी।।
(वह सोचने लगी कि) यहाँ और वहाँ मैंने दो बालक देखे। यह मेरी बुद्धि का भ्रम है या और कोई विशेष कारण है? प्रभु श्री रामचन्द्रजी माता को घबड़ाई हुई देखकर मधुर मुस्कान से हँस दिए।।
 
देखरावा मातहि निज अद्भुत रूप अखंड।
रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड।।  (बालकाण्ड दो० २०१)  
फिर उन्होंने माता को अपना अखंड अद्भुत रूप दिखलाया, जिसके एक-एक रोम में करोड़ों ब्रह्माण्ड लगे हुए हैं।।
 
अगनित रबि ससि सिव चतुरानन। बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन।।
काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ। सोउ देखा जो सुना न काऊ।।
अगणित सूर्य, चन्द्रमा, शिव, ब्रह्मा, बहुत से पर्वत, नदियाँ, समुद्र, पृथ्वी, वन, काल, कर्म, गुण, ज्ञान और स्वभाव देखे और वे पदार्थ भी देखे जो कभी सुने भी न थे।।
 
देखी माया सब बिधि गाढ़ी। अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी।।
देखा जीव नचावइ जाही। देखी भगति जो छोरइ ताही।।
सब प्रकार से बलवती माया को देखा कि वह (भगवान के सामने) अत्यन्त भयभीत हाथ जोड़े खड़ी है। जीव को देखा, जिसे वह माया नचाती है और (फिर) भक्ति को देखा, जो उस जीव को (माया से) छुड़ा देती है।।
 
तन पुलकित मुख बचन न आवा। नयन मूदि चरननि सिरु नावा।।
बिसमयवंत देखि महतारी। भए बहुरि सिसुरूप खरारी।।
(माता का) शरीर पुलकित हो गया, मुख से वचन नहीं निकलता। तब आँखें मूँदकर उसने श्री रामचन्द्रजी के चरणों में सिर नवाया। माता को आश्चर्यचकित देखकर खर के शत्रु श्री रामजी फिर बाल रूप हो गए।।
 
अस्तुति करि न जाइ भय माना। जगत पिता मैं सुत करि जाना।।
हरि जननी बहुबिधि समुझाई। यह जनि कतहुँ कहसि सुनु माई।।
(माता से) स्तुति भी नहीं की जाती। वह डर गई कि मैंने जगत्पिता परमात्मा को पुत्र करके जाना। श्री हरि ने माता को बहुत प्रकार से समझाया (और कहा-) हे माता! सुनो, यह बात कहीं पर कहना नहीं।।

नर हो, न निराश करो मन को

मैथिली शरण गुप्त जी की सुन्दर पंक्तियाँ...

नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को ।

संभलो कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलम्बन को
नर हो, न निराश करो मन को
जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को ।

निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
मरणोंत्‍तर गुंजित गान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
कुछ हो न तज़ो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को ।

प्रभु ने तुमको दान किए
सब वांछित वस्तु विधान किए
तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो
फिर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को ।

किस गौरव के तुम योग्य नहीं
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
जान हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को ।

करके विधि वाद न खेद करो
निज लक्ष्य निरन्तर भेद करो
बनता बस उद्‌यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि है
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो ।  

Tuesday, August 19, 2014

स्वदेश प्रेम

६८वें स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी की सुन्दर पंक्तियाँ

जो भरा नहीं है भावों से,
जिसमें बहती रसधार नहीं।
 वह हृदय नहीं है पत्थर है,
 जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।

Tuesday, May 6, 2014

निराला ठाठ

भारत जैसा देश न दुनिया में है, और न होगा…

निराशा और रोज़ के झमेलों में लोग यह भूल जाते हैं।    मैं उनसे कहता हूँ कि रोज़ आप आशा से जीवन व्यतीत करें और अपने भारतीय होने के सौभाग्य को याद रखें। 

यह बलिदान की धरती है, इसकी मिट्टी से तिलक करना चाहिये.… सुनिए यहाँ पर

जय हिन्द !!!

Tuesday, January 28, 2014

जीवन कर्म प्रधान

सनातन धर्म के दो मुख्य तत्व हैं --
अभ्युदय (भौतिक समृद्धि) और
निश्रेयस (आत्मिक सुख)
इसका एक अर्थ यह है कि बाहर से संसार और अंदर से सन्यास।    यही जीवन का सत्य है और यही कर्मयोग का सिद्धांत है।   बाहर की समृद्धि (धन, परिवार आदि)  के सुख में आसक्ति नहीं होनी चाहिए।   बस कर्म करते रहना चाहिए और भगवान को समर्पित करना चाहिए। 

तुलसीदास जी  कहते हैं.…
करम प्रधान विश्व रचि राखा  

(जीवन कर्म प्रधान  है,  इसमे फल की चिंता किये बिना कर्म करते रहना चाहिए।  असफलताओं से घबराना नहीं चाहिए जो तात्कालिक ही होती हैं।  )

Sunday, February 12, 2012

लक्ष्मण-निषाद संवाद

जब निषादराज ने राम और सीता को धरती पर सोते हुए देखा, तब उसको बहुत दुःख हुआ। तब लक्ष्मण जी ने उसको ज्ञान, वैराग्य और भक्तिपूर्ण वाणी से समझाया...

काहु न कोउ सुख दुःख कर दाता। निज कृत करम भोग सब भ्राता॥
हे भाई! कोई किसी को सुख-दुःख का देने वाला नहीं है। सब अपने ही किए हुए कर्मों का फल भोगते हैं।

जोग वियोग भोग भल मंदा। हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा॥
जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू। सम्पति बिपति करमु अरु कालू॥
संयोग (मिलना), वियोग (बिछुड़ना), भले-बुरे भोग, शत्रु, मित्र और उदासीन- ये सभी भ्रम के फंदे हैं। जन्म-मृत्यु, सम्पत्ति-विपत्ति, कर्म और काल- जहाँ तक जगत के जंजाल हैं।

धरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू॥
देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं॥
धरती, घर, धन, नगर, परिवार, स्वर्ग और नरक आदि जहाँ तक व्यवहार हैं, जो देखने, सुनने और मन के अंदर विचारने में आते हैं, इन सबका मूल मोह (अज्ञान) ही है। परमार्थतः ये नहीं हैं।

सपनें होइ भिखारि नृपु रंकु नाकपति होइ।
जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ॥
जैसे स्वप्न में राजा भिखारी हो जाए या कंगाल स्वर्ग का स्वामी इन्द्र हो जाए, तो जागने पर लाभ या हानि कुछ भी नहीं है, वैसे ही इस दृश्य-प्रपंच को हृदय से देखना चाहिए।

अस बिचारि नहिं कीजिअ रोसू। काहुहि बादि न देइअ दोसू॥
मोह निसाँ सबु सोवनिहारा। देखिअ सपन अनेक प्रकारा॥
ऐसा विचारकर क्रोध नहीं करना चाहिए और न किसी को व्यर्थ दोष ही देना चाहिए। सब लोग मोह रूपी रात्रि में सोने वाले हैं और सोते हुए उन्हें अनेकों प्रकार के स्वप्न दिखाई देते हैं।

एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी॥
जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब सब बिषय बिलास बिरागा॥

इस जगत रूपी रात्रि में योगी लोग जागते हैं, जो परमार्थी हैं और प्रपंच (मायिक जगत) से छूटे हुए हैं। जगत में जीव को जागा हुआ तभी जानना चाहिए, जब सम्पूर्ण भोग-विलासों से वैराग्य हो जाए।

होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा। तब रघुनाथ चरन अनुरागा॥
सखा परम परमारथु एहू। मन क्रम बचन राम पद नेहू॥
विवेक होने पर मोह रूपी भ्रम भाग जाता है, तब (अज्ञान का नाश होने पर) श्री रघुनाथजी के चरणों में प्रेम होता है। हे सखा! मन, वचन और कर्म से श्री रामजी के चरणों में प्रेम होना, यही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ (पुरुषार्थ) हैं।

राम ब्रह्म परमारथ रूपा। अबिगत अलख अनादि अनूपा॥
सकल बिकार रहित गतभेदा। कहि नित नेति निरूपहिं बेदा॥
श्री रामजी परमार्थस्वरूप (परमवस्तु) परब्रह्म हैं। वे अविगत (जानने में न आने वाले) अलख (स्थूल दृष्टि से देखने में न आने वाले), अनादि (आदिरहित), अनुपम (उपमारहित) सब विकारों से रहति और भेद शून्य हैं, वेद जिनका नित्य 'नेति-नेति' कहकर निरूपण करते हैं।

भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल।
करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहिं जग जाल॥

वही कृपालु श्री रामचन्द्रजी भक्त, भूमि, ब्राह्मण, गो और देवताओं के हित के लिए मनुष्य शरीर धारण करके लीलाएँ करते हैं, जिनके सुनने से जगत के जंजाल मिट जाते हैं।

सखा समुझि अस परिहरि मोहू। सिय रघुबीर चरन रत होहू॥
कहत राम गुन भा भिनुसारा। जागे जग मंगल सुखदारा॥

हे सखा! ऐसा समझ, मोह को त्यागकर श्री सीतारामजी के चरणों में प्रेम करो। इस प्रकार श्री रामचन्द्रजी के गुण कहते-कहते सबेरा हो गया! तब जगत का मंगल करने वाले और उसे सुख देने वाले श्री रामजी जागे।

(अयोध्याकाण्ड दोहा ९१-९३)

Thursday, February 9, 2012

प्रभु की शिशुलीला

तुलसीदास जी ने बहुत ही सुंदर वर्णन किया है प्रभु के जन्म का। साथ ही माता के आग्रह का, जो शिशुलीला देखने को उत्सुक हैं...
इसको सुनिए यहाँ पर...

भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी । हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी ॥
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी । भूषन वनमाला नयन बिसाला सोभासिन्धु खरारी ॥
कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता । माया गुन ग्यानातीत अमाना वेद पुरान भनंता ॥
करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता । सो मम हित लागी जन अनुरागी भयौ प्रकट श्रीकंता ॥
ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै । मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै ॥
उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै । कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै ॥
माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा । कीजे सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा ॥
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा । यह चरित जे गावहि हरिपद पावहि ते न परहिं भवकूपा ॥

Thursday, January 19, 2012

बालकाण्ड

नए वर्ष की शुरुवात कुछ सुंदर पंक्तियों के साथ...
बालकाण्ड १.१
बालकाण्ड १.२
बालकाण्ड १.३

Friday, May 6, 2011

तप के प्रकार (भगवदगीता)

जीवन का तप मात्र वन में जाकर ध्यान समाधि लगाने से ही नहीं होता है। जीवन के प्रत्येक आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ व सन्यास) में तप किया जा सकता है। धर्म के बताये मार्ग पर चलते रहकर दृढ अनुशासन से हमेशा कठिन प्रयत्न करते रहना भी तप है। तप से व्यक्ति में विशेष उत्साह और शक्तियां आती हैं। इनका पालन करने से तपोबल आता है, जो कठिन लक्ष्यों को भी अपने प्रभाव से आसान बना देता है।

भगवान् कृष्ण ने गीता में अपने अनमोल वचनों में तप के विभिन्न प्रकार बताये हैं -- शरीर-संबंधी तप, वाणी-संबंधी तप और मन-संबंधी तप ।

१. देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्। ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥ (गीता १७/१४)
देव, विप्र, गुरु और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा -- यह शरीर-संबंधी तप कहलाते हैं।

२. अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥ (गीता १७/१५)
उद्वेग (क्षोभ) न पैदा करने वाला, सत्य, प्रिय और यथार्थ बोलना, वेद-शास्त्रों को पढना और परमात्मा का नाम जपना -- यह वाणी-संबंधी तप कहलाते हैं।

३. मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः। भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥
(गीता १७/१६)
मन की प्रसन्नता, शांतभाव, भगवान् का चिंतन करते हुए कर्म करना, मन पर नियंत्रण और अंतःकरण की पवित्रता -- यह मन-संबंधी तप कहलाते हैं।

पात्र की योग्यता

कुछ चीजों पर समय नहीं बर्बाद करना चाहिए क्योंकि उन पर प्रयत्न विफल ही हो जाता है। इनमें ओछे लोगों की मित्रता भी एक है। रहीम जी ने एक दोहे में कहा है...

रहिमन ओछे नरन से बैर भली न प्रीत।
काटे चाटे स्वान के दोउ भांति विपरीत॥

इसका अर्थ है कि ओछे लोगों, जिनकी कथनी और करनी विश्वास के योग्य नहीं है, से न तो दोस्ती भली है, न ही दुश्मनी भली। जिस प्रकार कुत्ते के काटने (दुश्मनी) और चाटने (स्नेह) दोनों में ही अपना नुक्सान हो सकता है, उसी प्रकार ओछा व्यक्ति आपसे स्नेह करके भी आपको धोखा दे सकता है।

इसी सन्दर्भ में तुलसीदास जी ने कहा है कि केले (कदरी) के पेड़ में कितना भी पानी डाल दो, वह तभी फल देता है जब उसको काट दो। उसी तरह नीच तभी मानता है जब उसको डांटना पड़े।

काटेहि पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोइ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥
(सुन्दरकाण्ड दो० ५८)

इसी प्रकार कुछ तरह के लोगों पर समय नहीं बर्बाद करना चाहिए। इनमें से तुलसीदास जी कहते हैं...

सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुन्दर नीती॥
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥
(सुन्दरकाण्ड दो० ५७ चौ० २/३)

मूर्ख से विनती, धूर्त से स्नेह, स्वाभाविक कंजूस से उदारता की बातें, ममता में फंसे हुए से ज्ञान की बातें, बहुत लालची से वैराग्य की बातें, क्रोधी से शांति और कामी से भगवान् की कथा का फल वैसा ही होता है, जो बंजर धरती में बीज बोने से होता है। इनका परिणाम व्यर्थ ही होता है।

Thursday, March 24, 2011

मित्रता हो तो ऐसी...

सीस पगा न झगा तन पे प्रभु, जानै को आहि बसै केहि ग्रामा।
धोती फटी-सी लटी दुपटी अरु, पाँयउ पानह की नहिं सामा॥
द्वार खड़ो द्विज दुर्बल एक, रह्यौ चकि सों वसुधा अभिरामा।
पूछत दीन दयाल को धाम, बतावत आपनो नाम सुदामा॥

बाकी देखिये यहाँ पर...
कौन ये महत्वपूर्ण आ गया है द्वार पर, कि अगुवानी करने को ऐसे अकुलाते हैं...
इति

Sunday, April 18, 2010

प्रेम में कपट का स्थान नहीं...

तुलसीदास जी कहते हैं...प्रेम में कपट का कोई स्थान नहीं होता...

जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि।
बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि॥ [बालकाण्ड सोo ५७ (ख)]

प्रीति की सुंदर रीति देखिये कि जल भी [दूध के साथ मिलकर] दूध के समान भाव बिकता है; परन्तु फिर कपटरुपी खटाई पड़ते ही पानी अलग हो जाता है [दूध फट जाता है] और स्वाद (प्रेम) जाता रहता है।

Thursday, April 15, 2010

विषय चिंतन

भगवदगीता अध्याय २
श्लोक ६२:
ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते।
संगात्संजायते कामः कामातक्रोधोऽभिजायते॥

विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है।
(When one dreams of worldly objects, he gets infatuated with them. From infatuation arise Desires. Any obstruction in fulfilment of these desires creates Anger.)

श्लोक ६३:
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्म्रृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

क्रोध से अत्यंत मूढ़भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम होने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है।
(Anger brings Delusion (Foolishness); from Delusion arises Confusion of right and wrong. The Confusion leads to Loss of Wisdom, which in turn spells utter destruction.)

Friday, January 15, 2010

बिन प्रेम के भगवान नहीं

तुलसीदास जी कहते हैं...

मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किएँ जोग तप ग्यान बिरागा।।
कोई कितना भी योग, तप, ज्ञान या वैराग्य का पालन करे, उसको भगवान नहीं मिलेंगे जिसके मन में उनके लिए सच्चा प्रेम नहीं होगा।


हरि ब्यापक सर्वत्र समाना। प्रेम ते प्रगट होंहि मैं जाना॥
भगवान हर जगह व्याप्त हैं। किसी को उन्हें कुछ दिखाने की जरुरत नहीं है। उन्हें आपके मन और जीवन दोनों की स्थिति का पूरा ज्ञान है। लेकिन वो प्रकट होते हैं, तो केवल उसी के लिए, जिसके मन में उनके लिए सच्चा प्रेम हो।

Saturday, January 2, 2010

राम नाम अति मीठा है...

सुनिए अनूप जलोटा जी की आवाज में यहाँ पर

राम नाम अति मीठा है कोई गा के देख ले।
राम नाम अति मीठा है कोई गा के देख ले
आ जाते हैं राम कोई बुला के देख ले।
राम नाम अति मीठा है कोई गा के देख ले॥

जिस घर में अंधकार वहाँ मेहमान कहाँ से आये।
जिस मन में अभिमान वहाँ भगवान कहाँ से आये।
जिस घर में अंधकार उस घर में मेहमान कहाँ से आये।
जिस मन में अभिमान उस मन में भगवान कहाँ से आयें।
अपने मन मंदिर में जोत जला के देख ले।
आ जाते हैं राम कोई बुला के देख ले।
राम नाम अति मीठा है...

आधे नाम में आ जाते हैं, हो कोई बुलाने वाला।
बिक जाते हैं राम, कोई हो मोल चुकाने वाला।
आधे नाम में आ जाते हैं, हो कोई बुलाने वाला।
बिक जाते हैं राम, कोई हो मोल चुकाने वाला।
कोई शबरी, झूठे बेर खिला के देख ले।
आ जाते हैं राम, कोई बुला के देख ले।
राम नाम अति मीठा है...

सीता राम सीता राम सीता राम कहिये।
सीता राम सीता राम सीता राम कहिये।
सीता राम कहिये सीता राम कहिये।
जाही विधि राखें राम ताहि विधि रहिये।

राम नाम अति मीठा है कोई गा कर देख ले।
आ जाते हैं राम कोई बुला कर देख ले॥

Saturday, November 28, 2009

एक ख्याल बस यूँ ही...

आज बिस्तर पर लेटे लेटे मैं एक पिक्चर फ्रेम को देख रहा था जिसे मेरे पापा ने सजाया था। उसमें उन्होंने उस फ्रेम की बनावट के हिसाब से परिवार के सब लोगों की अलग अलग तसवीरें लगा दी थीं। हालाँकि उनका आकार अलग अलग था, लेकिन वह फिर भी अपने अनूठे अंदाज़ में एक थीं। देखते देखते मैं सोच रहा था कि कर्तव्य और प्रेम के कितने पावन धागे से इस परिवार के सदस्य आपस में बंधे हुए हैं। शरीर हो न हो, कर्तव्य और उसके ऋण हमेशा रहते हैं। इन्हीं ख्यालों में दोपहर के आराम का वक्त निकल गया।

वक्त बीतते वक्त नहीं लगता। जैसे बचपन से जवानी आयी, वैसे ही बुढ़ापा भी आएगा। यह तो एक अटल सत्य है। मानव शरीर पाना ही एक बहुत दुर्लभ संयोग है। इसमें अगर अच्छी संगत भी मिले, तो क्या कहने। बहुत भाग्य से ऐसी बुद्धि मिलती है जो हमेशा धर्म के रास्ते पर ले चले। यहाँ पर भटकने में वक्त नहीं लगता। कलियुग की दास्ताँ ऐसी ही है कि धर्म की बातें वही पुरानी हैं, लेकिन अर्थ बदल गया है अपनी सुविधानुसार। वह जीवनमूल्य जो रघुकुल ने समाज को दिए थे, उनको अपनाने का साहस आजकल बहुत कम में होता है। कर्तव्यों की परिभाषा को भी लोगों ने बदल लिया है। कौन सा लक्ष्मण, कौन सी सीता, कौन से दशरथ, कौन सी गीता। संतोष, धीरज और बलिदान अब केवल तिरंगे की पट्टियों पर ही दिखते हैं। उनके अर्थ को समझने और उनका उदाहरण प्रस्तुत करने वाले गुरु बिरले ही मिलते हैं। मेरे माता-पिता के आजीवन त्याग, धैर्य और संतोष से इन्हीं जीवनमूल्यों का उदहारण देखते हुए मुझे अपने ऋणों का अहसास प्रतिदिन होता है।

सोचता रहा कि सभी की बची जिंदगी में उस ऋण को चुकाने का सबसे अच्छा उपाय कौन है। सारे बुद्धि के किनारों को टटोलने के बाद भी मुझे एक ही रास्ता दिखाई पड़ा, वह है सेवा का। उनकी खुशी में मेरा कितना आनंद है, शायद उन्हें भी नहीं पता। लेकिन सच्चा सुख इस सरल सेवामय जीवन के अलावा मैं अभी तक और तो कहीं ढूंढ नहीं पाया...

Saturday, November 21, 2009

Pomegranate (अनार)

Full of powerful antioxidants to rejuvenate your life

Good for digestion when consumed mixed with 1 tsp ginger juice

More later...

Monday, November 16, 2009

In My Father's Words...

"मन लोभी मन लालची, मन चंचल मन चोर।
मन के मत चलिए नहीं, पलक पलक मन और॥
"

(मत = भरोसे)

Saturday, November 14, 2009

A Verse from Gita

Taken from Gandhi ji's autobiography (Story of My Experiments with Truth) is the following verse from the second chapter of Gita...

If one
Ponders on objects of the sense, there springs
Attraction; from attraction grows desire,
Desire flames to fierce passion, passion breeds
Recklessness; then the memory -- all betrayed --
Lets noble purpose go, and saps the mind,
Till purpose, mind, and man are all undone.

"Farsighted" Vision

Walking through a dark forest inhabiting lions and snakes, would you be looking at your steps or at a distance? If you look out for the lions at a distance, you may step over a snake unknowingly. But, if you just watch where you step, you may unwittingly walk up to a waiting lion's face. So, which one would you prefer -- a snakebite or a lionkill? In the humor above, my point is, would you or should you overlook the small for the big? This example just highlights the importance of far-sight. And, of course not in the crude way it is questioned above...

This brings us to the importance of vision. It creates a power to see beyond present circumstances and create what does not yet exist. As Covey says, it gives us capacity to live out of our imagination instead of our memory.

If our vision is based on illusion, we make choices that fail to create quality-of-life results that we expect. We become disillusioned and cynical and don't trust our dreams anymore. If our vision is partial based only on economic and social needs ignoring mental and spiritual needs, we make choices that lead to imbalance. If our vision is based on the social mirror, we make choices based on expectation of others and living out their scripts.

Vision has a passion that empowers us to trascend fear, doubt, discouragement and other that keep us from accomplishment. The passion of shared vision empowers people to transcend the petty, negative interactions that consume so much time and effort and deplete quality of life. So, if you don't have it, make a vision for yourself today and refine it as you sail through your daily journey. And, if you already have one, learn to evaluate interruptions as no more than just minor obstacles while keeping eyes on your vision. And, Have faith in the promises of tomorrow.

Wednesday, November 11, 2009

A Prayer from My Mother's College...

इन शब्दों पर भी जरा विचार कीजिये...

वह शक्ति हमें दो दयानिधे, कर्तव्य मार्ग पर डट जाएँ,
पर सेवा पर उपकार में हम, निज जीवन सफल बना जाएँ।

हम दीन दुखी निबलों विकलों, के सेवक बन संताप हरें,
जो हो भूले भटके बिछुड़े, उनको तारें ख़ुद तर जाएँ,
छल द्वेष दंभ पाखण्ड झूठ, अन्याय से निसि दिन दूर रहें,

जीवन हो शुद्ध सरल अपना, शुचि प्रेम सुधा रस बरसाएँ,
निज आन मान मर्यादा का, प्रभु ध्यान रहे अभिमान रहे,
जिस देव भूमि में जन्म लिया, बलिदान उसी पर हो जाए,

वह शक्ति हमें दो दयानिधे, कर्तव्य मार्ग पर दत्त जाएँ,
पर सेवा पर उपकार में हम, निज जीवन सफल बना जाएँ।

Friday, November 6, 2009

मिथ्या दोष

तुलसीदास जी कहते हैं...

जो न तरै भव सागर, नर समाज अस पाइ।
सो कृत निंदक मंदमति, आत्माहन गति जाइ॥ (उत्तरकाण्ड दोहा ४४)

जो मनुष्य ऐसे साधन पाकर भी भवसागर से तरने का प्रयास नहीं करता है या जन्म-मरण के चक्र से छूटने का प्रयास नहीं करता है, वह कृतघ्न, निंदनीय और मंदमति है। वह आत्मा का हनन करता है और आत्महत्या करने वाले की गति को प्राप्त होता है।

सो परत्र दुःख पावइ, सिर धुनि धुनि पछिताय।
कालहिं कर्महिं ईश्वरहिं, मिथ्या दोष लगाय॥ (उत्तरकाण्ड दोहा ४३)


वह परलोक में दुःख पाता है, सिर पीट पीटकर पछताता है और अपना दोष न समझकर (वह उल्टे) काल पर, कर्म पर या ईश्वर पर मिथ्या दोष लगाता है।


इसका अर्थ यह है कि इन तीनों पर दोष लगाना व्यर्थ है। श्री कृपालुजी महाराज कहते हैं...कि अपने दोष या दुर्भाग्य को काल (कि समय बुरा है), कर्म (कि पिछले जन्म का कर्मफल है) या ईश्वर (कि भगवान ने यह मुझसे बुरा करवाया है) पर लगाना बहुत बड़ी नासमझी है। ऐसे भ्रम में रहकर अकर्मण्य बने रहना अपने ही नाश का मार्ग है। (इस पर लेख 'प्रेम रस सिद्धांत' में उपलब्ध है)

A Way to Conquer...

Small steps in right direction always bring success and victory, if you remain resilient to life's tests. This is how it is. Everyone is tested. Important is that we understand our shortcomings in facing these tests.

This topic, though, is about conquering your bad habits. Only when you realize the existence of such bad habits, you will acknowledge the need to slowly overcome them. Bad habits that are natural such as anger, laziness are equally bad as are acquired bad habits. One way to conquer them is to write down the circumstances that invoke those bad feelings or habits in your journal. Then, it's again important to review them later. As they say, the useful purpose of any accounting lies in its review. Until you revisit the past actions, you'll not discover any patterns leading you into such feelings or habits. You may even realize what exactly triggers such feelings over which you lose momentary control. That's why the secret of your victory lies in finding this non-obvious through your own introspection.

Thursday, October 22, 2009

वाणी का जादू

केवल मनुष्य ही एक ऐसा जीव है, जिसे भगवान ने वाणी को मन मुताबिक ढालने का वरदान दिया है। वाणी हमारे विचारों को पवित्र और दूषित भी कर सकती है। इसलिए इस वाणी के उपहार का सदुपयोग करने का सुझाव बहुत से संतों ने दिया है...

राम नाम मनि दीप धरु, जीह देहरी द्वार।
तुलसी भीतर बाहिरौ जौ चाहसि उजियार॥

तुलसी दास जी कहते हैं... जीभ ऐसी दरवाजे की देहरी है जहाँ पर राम नाम का "मणि दीप" रख देने से बाहर और भीतर दोनों का अँधेरा मिट जाता है और इस तरह जहाँ भी चाहो, वहां उजाला हो जाता है। इसका अर्थ वाणी की सच्चाई, सफाई, मधुरता और राम नाम के ध्यान और जाप से तो है ही, बल्कि ऐसा दीप रख पाने के मन के संकल्प और साहस से भी है।

ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय॥

कबीर दास जी कहते हैं... मन के अहंभाव को खोकर ऐसी वाणी बोलनी चाहिए कि अपने को तो शान्ति मिले ही, दूसरे भी प्रसन्न हो जाएँ।

Thursday, October 15, 2009

परम सत्य

ज्यादातर लोगों के लिए सच का मतलब सिर्फ़ सच बोलने में ही होता है। लेकिन असली सच का मतलब होता है... मन, कर्म और वचन का सत्य । इन तीनों के मेल से जो सत्य आता है, वही परम सत्य है। किंतु यह सत्य धर्मानुसार ही होना चाहिए।

यदि इन तीनों का मेल किसी सत्य में नहीं होता है, तो उस सत्य में विकार हो सकते हैं। जैसे...
ईर्ष्या/छल -- मन में कोई भावना, किंतु वचन में कुछ और
ढोंग/पाखंड/छल -- कहनी कुछ, किंतु करनी कुछ और
अहंकार/हठ -- मन के विवेक में कुछ, किंतु कर्म में कुछ और

जब हम परम सत्य नहीं बोलते या नहीं बोल पाते, तब यही विकार हमारे व्यवहार में आ जाते हैं। इस बात को जान लेने और ध्यान में रखने से ही हम अपने व्यवहार की जटिलता को समझ सकते हैं। परम सत्य को अपनाना कठिन जरुर होता है और तप करना पड़ता है, लेकिन इससे आपको हमेशा शान्ति और सुख का अनुभव होता रहेगा। जैसा कि अंग्रेज़ी में भी कहते हैं... "The Truth will set you free"

इसका मतलब यही है कि सत्य और सिर्फ़ परम सत्य ही मन, कर्म और वाणी के इस अनुपम तालमेल से आपके व्यक्तित्व और व्यवहार की बहुत से विकारों (या व्याधियों) को दूर कर सकता है।

पाँच उपाय

यह आचार्य अनिरुद्ध जी का लेख यहाँ पर उपलब्ध है... सारांश में इन्होंने बहुत अच्छे ५ उपाय बताये हैं।

भागदौड़ भरी जीवन शैली के चलते मनुष्य ने प्रकृति और स्वयं का सान्निध्य खो दिया है। इसी वजह से जीवन में कई तरह के रोग और शोक जन्म लेते हैं। हमारे पास नियमित रूप से योग करने या स्वस्थ रहने के अन्य कोई उपाय करने का समय भी नहीं है। यही सोचकर हम आपके लिए लाए हैं योग के यम, नियम और आसन में से कुछ ऐसे उपाय, जिनके जरिए आप फटाफट योग कर शरीर और मन को सेहतमंद रख सकते हैं।

(1) संयम ही तप है: संयम एक ऐसा शब्द है, जिसके आगे पदार्थ या परमाणुओं की नहीं चलती। ठेठ भाषा में कहें तो ठान लेना, जिद करना या हठ करना। यदि तुम व्यसन करते हो और संयम नहीं है तो मरते दम तक उसे नहीं छोड़ पाओगे। इसी तरह गुस्सा करने या ज्यादा बोलने की आदत भी होती है।

संयम की शुरुआत आप छोटे-छोटे संकल्प से कर सकते हैं। संकल्प लें कि आज से मैं वहीं करूँगा, जो मैं चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ खुश रहना, स्वस्थ रहना और सर्वाधिक योग्य होना। व्रत से भी संयम साधा जा सकता है। आहार-विहार, निंद्रा-जाग्रति और मौन तथा जरूरत से ज्यादा बोलने की स्थिति में संयम से ही स्वास्थ्य तथा मोक्ष घटित होता है। संयम नहीं है तो यम, नियम, आसन आदि सभी व्यर्थ सिद्ध होते हैं।

(2) ईश्वर प्रणिधान: एकेश्वरवादी न भी हों तो भी जीवनपर्यंत किसी एक पर चित्त को लगाकर उसी के प्रति समर्पित रहने से चित्त संकल्पवान, धारणा सम्पन्न तथा निर्भीक होने लगता है। यह जीवन की सफलता हेतु अत्यंत आवश्यक है। जो व्यक्ति ग्रह-नक्षत्र, असंख्‍य देवी-देवता, तंत्र-मंत्र और तरह-तरह के अंधविश्वासों पर विश्वास करता है, उसका संपूर्ण जीवन भ्रम, भटकाव और विरोधाभासों में ही बीत जाता है। इससे निर्णयहीनता का जन्म होता है।

(3) अंग-संचालन: अंग-संचालन को सूक्ष्म व्यायाम भी कहते हैं। इसे आसनों की शुरुआत के पूर्व किया जाता है। इससे शरीर आसन करने लायक तैयार हो जाता है। सूक्ष्म व्यायाम के अंतर्गत नेत्र, गर्दन, कंधे, हाथ-पैरों की एड़ी-पंजे, घुटने, नितंब-कुल्हों आदि सभी की बेहतर वर्जिश होती है, जो हम थोड़े से समय में ही कर सकते है। इसके लिए किसी अतिरिक्त समय की आवश्यकता नहीं होती। आप किसी योग शिक्षक से अंग-संचालन सीखकर उसे घर या ऑफिस में कहीं भी कर सकते हैं।

(4) प्राणायाम: अंग-संचालन करते हुए यदि आप इसमें अनुलोम-विलोम प्राणायाम भी जोड़ देते हैं तो यह एक तरह से आपके भीतर के अंगों और सूक्ष्म नाड़ियों को शुद्ध-पुष्ट कर देगा। जब भी मौका मिले, प्राणायाम को अच्छे से सीखकर करें।

(5) ध्यान: ध्यान के बारे में भी आजकल सभी जानने लगे हैं। ध्यान हमारी ऊर्जा को फिर से संचित करने का कार्य करता है, इसलिए सिर्फ पाँच मिनट का ध्यान आप कहीं भी कर सकते हैं। खासकर सोते और उठते समय इसे बिस्तर पर ही किसी भी सुखासन में किया जा सकता है।

उपरोक्त पाँच उपाय आपके जीवन को बदलने की क्षमता रखते हैं, बशर्ते आप इन्हें ईमानदारी से नियमित करें।


बाकी योग पर अच्छे लेख भी पढ़िये... वेबदुनिया के आलेखों में

Sunday, October 11, 2009

होनहार बिरवान के होत चीकने पात

इस कहावत पर प्रेमचंद जी ने एक साहित्यिक नाटक लिखा है। इस कहावत का अर्थ है कि जो होनहार (प्रतिभाशाली) लोग होते हैं, उनके ढंग और गुण ही निराले होते हैं। वह मामूली लोगों से अपनी सोच के बल से अलग दिखते हैं।
(बिरवान = पेड़, पात = पत्ते)

यहाँ पढिये... प्रेमचंद का जीवन परिचय (सारांश)
एवं हिन्दी के अन्य कवि और लेखक

Friday, October 2, 2009

A Tribute to Gandhi ji on His Birthday...

"Be a Vegetarian"

As Bapu was. He writes in his autobiography, The Story of My Experiments with Truth...

"There are many causes that I am prepared to die for but no causes that I am prepared to kill for."

Albert Einstein once said of Mahatma, "Generations to come will scarce believe that such a one as this walked the earth in flesh and blood."

Tuesday, September 29, 2009

सिय चरित्र

ग्रंथों में भगवान राम के चरित्र का वर्णन तो हर जगह मिलता है, लेकिन आज मैं सीता जी के पावन चरित्र पर कुछ लिखना चाहूँगा। सीता जी ने जिन नारी आदर्शों का उदाहरण दिया है, वह चरित्र अतुलनीय है।

ग्रंथों को पढने और समझने का असली आनंद सूक्ष्म बुद्धि से ही आता है, स्थूल बुद्धि से नहीं ** सूक्ष्म बुद्धि से हम यह अच्छी तरह से समझ सकते हैं कि देवी होते हुए भी सीता जी ने जो मनुष्य रूप में चरित्र दिखाया, उसी को "लीला" कहते हैं और वही लीला समाज को आदर्श चरित्र का अर्थ दिखाती है और उसे अपनाने की प्रेरणा देती है। सीता जी जगतमाता लक्ष्मी जी का अवतार मानी गई हैं, किंतु उन्होंने हर अवसर पर अपने बुजुर्गों से जीवन शिक्षा पाने की कोशिश भी की।

सुनिए.... माता की शिक्षा और अत्रि ऋषि-आश्रम में महासती अनुसूया का परामर्श

** सूक्ष्म -- spiritual, स्थूल -- physical

अभी पूरा नहीं हुआ। बाकी बाद में...

Monday, September 28, 2009

विवेक और ज्ञान

आजकल की रंग बिरंगी दुनिया में लोग खो जाते हैं अनजानी दौड़ में। उसका थोड़ा कारण अपना विवेक न होना भी होता है। पुराने जमाने में पढ़ाई के साथ-साथ चरित्र की बातों पर भी जोर दिया जाता था। आजकल इन बातों को सीखने के समय को टीवी ने ले लिया है। ज्ञान मिलना ही काफ़ी नहीं होता है, उस ज्ञान का इस्तेमाल कब, कैसे, कहाँ और क्यों करना है, यह हमारा विवेक हमको बताता है।

खासकर जहाँ पर तौलने के पैमाने बदल जाते हैं, वहां चूक होना बहुत आसान होता है। जैसे दो अलग-अलग संस्कृतियों के लोगों की तुलना करना किसी पर्यटक के लिए कठिन हो सकता है। अमीर देशों के कर्मों से निचले दर्जे के नागरिक भी देखने में सभ्य, स्वभाव और बातों में जोरदार लगते हैं, किंतु उनमें फर्क संस्कृति को समझने के बाद ही पता चलता है। मानव स्वभाव में एक कमजोरी झुंड में चलने की होती है। यह आदत तो हमारे उत्पत्ति से ही हमारे अंदर होती है। लेकिन हम अपने ज्ञान को सामने रखकर किसी भी स्थिति में कैसे उपाय करें, यह हमारे संस्कार और विवेक हमें दिखलाते हैं। जीवन में अनुभव धीरे धीरे ही आता है। इसीलिए हमारा विवेक कितना परिपक्व हुआ है, इसका पता परिस्थितियों के आने पर ही लगता है। विवेक में निखार हमारे अपने खुलेपन से आता है, सीखने की चाहत और दृढ़ विश्वास की जरुरत होती है।

कबीर दास जी कहते हैं...
फूटी आँख विवेक की, लखे ना सन्त असन्त।
जाके संग दस-बीस हैं, ताको नाम महन्त॥

जब किसी की विवेक की आँख फूट जाती है, अर्थात विवेक नहीं रह जाता है, तब उसको संत और असंत में फर्क नहीं मालूम पड़ता है। जिसके साथ भी १०-२० लोग दिखाई पड़ते हैं, वह उसीको महंत मानने लगता है।

या अनुरागी चित्त की...

या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोइ।
ज्यों-ज्यों बूड़ै स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्जलु होइ॥

कोई भी इस प्रेमी ह्रदय की गति को नहीं समझ सकता है। जैसे जैसे यह श्याम रंग (अर्थात भगवान के प्रेम) में डूबता है, वैसे वैसे ही यह उज्जवल होता जाता है और मन शुद्ध होता जाता है। (कवि ने श्याम (यानि काले) रंग में डूबने से उजला होते दिखाया है)

सात्विक जीवन मूल्यों में भगवान का वास माना गया है। जैसे कबीर दास कहते हैं, जहाँ क्षमा, वहां आप। उसी तरह अच्छे गुण दूसरों के नहीं, बल्कि अपने ही भले के लिए होते हैं।

Saturday, September 26, 2009

Hanging outside a small shop was a notice board:

In God We Trust
All Others Pay Cash

:-)

Tuesday, September 15, 2009

विश्वास

मन का विश्वास एक ऐसी अपार शक्ति है जिससे बड़े बड़े चमत्कार हो जाते हैं। चाहे कोई रोग हो, चाहे कितनी भी कठिन जीवन-स्थिति हो या फिर पर्वत से भी ऊँचे लक्ष्य हों। सब हमारे विश्वास के आगे छोटे पड़ जाते हैं। विश्वास के साथ चाहिए हमको -- दृढ़ संकल्प, अटूट श्रद्धा और फिर से उठ खड़े होने की क्षमता। थोडी से बातों से विश्वास डगमगा जाना तो बहुत ही मामूली है। अगर यह आपके साथ होता है, तो इसमें कोई ख़राब बात नहीं है। यह तो प्रकृति ने सभी जीवों को दिया है, जो उन्हें अपना प्राथमिक लक्ष्य (जो कि जीवित रहना है) पूरा करने में मदद करता है। किसी भी कठिनाई (या जानलेवा परिस्थिति) के लिए शरीर का पहला जवाब उससे दूर भागना होता है। वैसे सामान्य परिस्थितियों से जीव चार तरीके से निपटता है, उनपर -- विजय पाकर, स्वीकार करके, परहस्त करके (दूसरे को देकर), या टालकर। कठिन परिस्थितियां हमें मजबूर कर सकतीं हैं, आसान राह लेने के लिए या अपनी शक्तियों की पहचान करके विश्वास के साथ कठिन राह लेने के लिए।

विश्वास एक ऐसा गुण है जो हमको बहुत प्रयत्न से मिलता है। भगवान सभी को सब कुछ इसीलिए नहीं देता है क्योंकि वह देखना चाहता है कि लेने वाले में कितनी चाहत है लेने की। विश्वास की डोर जितनी मजबूत होगी, हमें सफलता भी उतनी अधिक मिलेगी। जैसे आप रोगी को कितनी भी दवाएं खिला दें, उसको फायदा नहीं होगा जब तक उसका उन दवाओं पर विश्वास नहीं होगा। विश्वास जो शंका से भरा हुआ है, वह मजबूत नहीं हो सकता क्योंकि उसमें पूरी श्रद्धा नहीं हो सकती। लाखों लोग मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारे वगैरह जाकर पूजा करते हैं, लेकिन आज तक भगवान को किसी ने नहीं देखा। कबीर दास जी कहते हैं... "ना काबे में, ना कैलाश में। मोको कहाँ तू ढूंढें रे बन्दे, मैं तो तेरे विश्वास में।" तुलसीदास जी ने भी कहा है..."सातवाँ सम मोहि मय जग देखा।" इसका अर्थ है कि (नवधा भक्तियों में सातवें प्रकार की) भक्ति सारे जगत को राममय देखने से होती है कि भगवान इस जगत के सारे जीवों में ही हैं और हम यह विश्वास रखकर ही भक्ति करें। इसका सारांश यही है कि, सर्वत्र और हमारे विश्वास में साक्षात भगवान का वास होता है। वहीँ से उनकी प्रेरणा आती है, जो हमें जीवन मार्ग दर्शन देती है।

विश्वास जीवन के रिश्तों को भी मधुर बना देता है। रिश्तों में भी हमारा पहला ध्यान सबसे बड़े लक्ष्य पर ही होना चाहिए। सबसे छोटी बातों को तो नजरअंदाज़ कर देना चाहिए क्योंकि इससे अपनी ही शान्ति चली जाती है। बुद्ध धर्म में भी कहा गया है कि क्रोध का सबसे बड़ा नुकसान ख़ुद को ही होता है, क्योकि वह अंदर ही अंदर आपको जला देता है, चाहे आप स्वीकार न भी करो। जब भृगु ऋषि ने विष्णु जी को लात मारकर जगाया था, तब विष्णु जी ने पहले पूछा कि ऋषि के पैर में चोट तो नहीं लगी। इस सुंदर उदहारण से दिखता है कि, गुस्से का कारण भले ही अपने हाथ में हो , लेकिन हमारी अपनी प्रतिक्रिया हमेशा अपने हाथ ही होती है। इस बात पर कभी गौर फरमाइयेगा। जब हमारा ध्यान सबसे बड़े लक्ष्य पर होता है, तब हमको अर्जुन की तरह सिर्फ़ चिड़िया की आँख ही दिखाई देती है और हम दुनिया के बाकी छोटे-बड़े भुलावों को नहीं देख पाते। मेरी पसंदीदा फ़िल्म राजेश खन्ना वाली 'बावर्ची' में इस चीज को बहुत खूबसूरती से दिखाया गया है। जब हम कोई भी अपेक्षा न रखकर दूसरों को सच्चा प्यार देने लगते हैं, तब हमको दूसरों से भी वही प्यार वापस मिलने लगता है। इसमें भी विश्वास का एक अटूट बंधन है कि हमको प्यार मिलकर ही रहेगा। गाँधी जी के सत्याग्रह और अहिंसा के मार्ग पर भी उनका यही दृढ़ विश्वास था कि समय जरुर लगेगा, लेकिन जीत उनके विश्वास की ही होगी। यही लगन है जो हारे हुए को भी हार मानने नहीं देती। अब्राहम लिंकन जिंदगी भर हारते रहे, लेकिन शायद उनको जिंदगी हार मानना सिखाना ही भूल गई थी और अंत में वे राष्ट्रपति बने। मान लें कि आपका अपना भाग्य आपके हाथ में नहीं होता, लेकिन आपका अपना संकल्प अपने हाथ जरुर होता है। इसलिए, अभ्यास कीजिये कि आप अपने विश्वास को इस कदर मजबूत बना लें कि वह भगवान भी आप की इस लगन पर मुस्कुरा दे।

Saturday, September 12, 2009

Recently Watched...

बोल री कठपुतली डोरी (कठपुतली, 1957)
इसी गाने का दूसरा रूप

शैलेन्द्र जी का बहुत ही सुंदर गाना और वैजयंतीमाला का खूबसूरत प्रदर्शन...

-------------------------------

यही है वह सांझ और सवेरा (सांझ और सवेरा, 1964)

Sunday, September 6, 2009

पंचतंत्र की कहानियाँ

बचपन में पढ़ा करते थे इन कहानियों को। आज अचानक पुरानी यादें ताजी हो गयीं इनको देख कर। आप ख़ुद ही देख लीजिये (click on links below)...

१. चतुर लोमड़ी (शिक्षा: चापलूसों से बचना चाहिए)
२. टोपियों का व्यापारी (शिक्षा: संकट में ठंडे मन से सोचना चाहिए)
३. अहसान फरामोश चूहा (शिक्षा: अपने "मालिक" का अहसान मानना चाहिए)
४. किसान के पुत्र (शिक्षा: एकता में ही शक्ति है)
५. गधे की सवारी (शिक्षा: अपने दिमाग से न सोचकर दूसरों के कहने पर चलने वाले की जगहंसाई होती है)
६. हाँथी की मित्रता (शिक्षा: मित्र वह जो मुसीबत में काम आए)
७. बिल्ली के गले में घंटी (शिक्षा: सुझाव देना आसान, पर अमल करना मुश्किल)
८. मुसीबत से छुटकारा (शिक्षा: एकता में ही शक्ति है)
९. धूर्त भेड़िया (शिक्षा: धोखाधडी वाला अंत में पकड़ा ही जाता है)
१०. जो हुआ अच्छा हुआ (शिक्षा: जो होता है, अच्छे के लिए ही होता है)

Saturday, September 5, 2009

सहिष्णुता

सहिष्णुता का अर्थ है, सहनशीलता। यह एक ऐसा अनमोल गुण है, जिसको पाकर मनुष्य बडे से बडे लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। किसी भी स्थिति को बिगाड़ लेना हमारे स्वाभिमान के लिये बहुत आसान है। लेकिन सहिष्णुता हमको यह दिखाती है कि हमारे लिये क्या आवश्यक है, स्वाभिमान की जीत या हमारा अन्तिम लक्ष्य। सहनशीलता के लिये जरूरी है कि हम बहुत से और जीवन मूल्यों को पहले सीखें, जैसे सन्तोष, विवेक और धीरज। सहनशील होना कमजोर होना बिल्कुल नहीं है। यह तो हमारी अपनी परिपक्वता की पहचान है। रहीम दास जी कहते हैं…

जैसी परै सो सहि रहे, कहि 'रहीम' यह देह।
धरती ही पर परग है, सीत, घाम औ' मेह॥

जो कुछ भी इस देह पर आ बीते, वह सब सहन कर लेना चाहिए । जैसे, जाड़ा, धूप और वर्षा पड़ने पर धरती सहज ही सब सह लेती है । सहिष्णुता धरती का स्वाभाविक गुण है ।

---------------------------------------------------------------------

इसी श्रंखला में युवाचार्य महाश्रमण जी का एक प्रवचन मैं नीचे लिखता हूँ। आप भी उसका आनन्द लीजिये…

सहना सुखी जीवन की एक अनिवार्य अपेक्षा है। जो सहना जानता है, वही जीना जानता है। जिसे सहना नहीं आता वह न तो शांति से स्वयं जी सकता है और न अपने आसपास के वातावरण को शांतिमय रहने देता है। जहां समूह है, वहां अनेक व्यक्तियों को साथ जीना होता है। जहां दूसरे के विचारों को सुनने, समझने, सहने और आत्मसात करने की क्षमता नहीं होती, वहां अनेक उलझनें खड़ी हो जाती हैं। जितने भी कलह उत्पन्न होते हैं, चाहे वे पारिवारिक हों या सामाजिक, उनके मूल में एक कारण असहिष्णुता है।

मनुष्य में दो प्रकार की वृत्तियां होती हैं। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो नैसर्गिक रूप से शांत प्रकृति वाले होते हैं, उनके सामने कितनी ही प्रतिकूल स्थिति क्यों न उत्पन्न हो जाए, उनके साथ कैसा भी अप्रिय व्यवहार क्यों न हो जाए, वे प्राय: कुपित नहीं होते। ऐसे व्यक्ति परिवार और समाज के लिए आदर्श होते हैं। हर व्यक्ति उस आदर्श तक न भी पहुंच सके, पर अभ्यास और दृढ़ संकल्प के द्वारा व्यक्ति अपनी आदत को परिष्कृत और परिमार्जित कर सकता है।

मनुष्य के पास शरीर है, वाणी है और मन है। जैन दर्शन की भाषा में इन तीनों की प्रवृत्ति को योग कहा जाता है। इन तीनों का आलंबन लिए बिना शुभ या अशुभ कोई भी प्रवृत्ति नहीं हो सकती। सहनशीलता और असहनशीलता की अभिव्यक्ति का संबंध शरीर, वाणी और मन तीनों के साथ है।

सबसे पहले हम शरीर को लें। कुछ व्यक्ति शरीर से बहुत कठोर श्रम कर लेते हैं, कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो थोड़े से श्रम से भी थकान का अनुभव करने लगते हैं। किसान खेतों में काम करते हैं। वे न धूप की परवाह करते हैं, न छांह की। फिर भी वे स्वस्थ रहते हैं। इसके विपरीत जो एयरकंडीशंड कमरों में रहने के अभ्यस्त हैं, वे मौसम के जरा सा प्रतिकूल होते ही बेचैन हो जाते हैं। इसके अनेक कारण हो सकते हैं। कुछ अंशों में अभ्यास की विभिन्नता भी एक कारण बनती है। शरीर को जिस स्थिति और जिस वातावरण में रखा जाता है, वह वैसा ही बन जाता है। मौसम बदलता रहता है। शरीर हर मौसम को झेल सके, ऐसा अभ्यास होना चाहिए। सर्दी के दिनों में कुछ संत जुकाम के भय से गले पर कपड़ा बांध लेते। आचार्य तुलसी कहते हैं कि ऐसा करना ठीक नहीं है। कपड़ा बांधकर रखने से गले का ठंडक झेलने का अभ्यास छूट जाता है। प्रतिरोधात्मक शक्ति कम हो जाती है। फिर थोड़ी-सी ठंडी हवा गले को लगी नहीं कि गला खराब हो जाता है। ऐसा देखा भी जाता है कि जो जितना अधिक ठंडक या गर्मी का बचाव करते हैं, वे उतना ही सर्दी-गर्मी से अधिक प्रभावित होते हैं।

शरीर की तरह मन को भी सहने का अभ्यास होना आवश्यक है। मानसिक असहिष्णुता ही तनाव, घुटन, कुंठा, उच्छृंखलता, अनुशासनहीनता आदि को जन्म देती है। जहां मन की असहिष्णुता चरम सीमा पर पहुंच जाती है, वहां आत्महत्या, परहत्या जैसी जघन्य घटनाएं घट जाती हैं। वर्तमान युग में असहिष्णुता की दर बढ़ती जा रही है। एक छोटा बच्चा भी तनाव की भाषा समझने लगा है। एक बहन ने बताया- मेरा लड़का पांच वर्ष का है। पढ़ाई कर रहा है। उस समय यदि उसे एक गिलास पानी लाने को बोल दूं तो कहेगा- मम्मी! मुझे डिस्टर्ब मत करो। मुझे टेंशन हो जाता है। मानसिक असहिष्णुता आपसी मैत्री की सरिता को सुखा देती है। पिता-पुत्र, सास-बहू व देवरानी-जेठानी के झगड़ों की तो बात क्या, पति-पत्नी के रिश्तों के बीच भी दरारें पड़ जाती हैं। आवश्यक है, मानसिक सहिष्णुता का विकास हो।

सहिष्णुता का एक प्रकार है वाणी की सहिष्णुता। जो व्यक्ति वाणी पर अंकुश रखना जानता है, वह असत्य भाषण से तो बचता ही है, आवेश और उत्तेजनापूर्ण भाषा पर भी नियंत्रण कर लेता है। वह कठोर भाषा नहीं बोलता। भाषा का असम्यक प्रयोग संबंधों में दूरियां बढ़ाती है। चिंतन और विचारपूर्ण व्यक्ति अपनी जबान को अपने वश में कर सकता है।

इस तरह शरीर, मन और वचन इन तीनों योगों को साध लिया जाए तो सहिष्णुता का गुण स्वत: विकसित हो जाएगा। सहिष्णुता का विकास आपकी चेतना में शांति और आनंद का अवतरण करने वाला सिद्ध होगा।

------------------------------------------------------------------------------------

Tuesday, September 1, 2009

लवकुश और राम-सीता आदर्श

पिछली कड़ी की तीन और कथाएँ जो भावनाओं को छू जाती हैं...

* श्रीराम और लवकुश संवाद भाग १ और भाग २
* लवकुश और सीता संवाद भाग १
* लवकुश का राम-सभा में संगीत
भाग १ और भाग २

"हे पितु, भाग्य हमारे जागे। राम कथा कही राम के आगे॥"

Monday, August 31, 2009

आस्तिक जीवन और कर्म योग

आजकल की भागदौड़ वाली ज़िन्दगी में सभी को तुंरत परिणाम चाहिए होता है। इसीलिए जब इच्छानुरूप फल नहीं मिलता है, तब कोई भी यह मानने लगता है कि भगवान् नहीं होते हैं, या भगवान् नहीं सुनते हैं। लेकिन लोग यह भूल जाते हैं कि भगवान् ही तो उनकी परीक्षा ले रहे हैं। यह बात भूलने वाली नहीं है कि हमको कर्मफल भुगतना ही पड़ेगा, चाहे वह इस जन्म के कर्मों का हो, या फिर पिछले जन्मों का। उसमें हम तर्क से जवाब नहीं पा सकते हैं। सोचिये...जिस कन्या के मामा स्वयं श्रीकृष्ण थे, जिसके पूर्वज भविष्यदर्शी वेद व्यास जी और इच्छा-मृत्यु वरदान वाले पितामह भीष्म थे, उस अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा को विधवा होने से कोई भी नहीं बचा सका था।

वैसे तो भगवद्गीता को सभी पढ़ सकते हैं, लेकिन जब भी पढें, तो उसके श्लोकों के भाव और अर्थ दोनों पर थोडी देर विचार करें। किसी भी अच्छे साहित्य को समझने का यही बढ़िया तरीका है। सिर्फ़ पुस्तक ख़तम करने के लिए ही न पढें। मेरे पास एक गीताप्रेस* का सबसे छोटा संस्करण "श्रीमद्भगवद्गीता (श्लोकार्थसहित)" है, जिसमे अध्याय ९ के २६वें श्लोक में श्रीकृष्ण जी कहते हैं...

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥

जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्धबुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुष्पादि मैं सगुणरूपसे प्रकट होकर प्रीतिसाहित खाता हूँ।

कहा गया है कि 'ना जाने किस भेस में नारायण मिल जाएँ' । इसलिए हमारी श्रृद्धा कम नहीं होनी चाहिए, सिर्फ़ इसलिए की फल तुंरत नहीं दिखता है। अपने कर्मों पर ध्यान देकर उन्हें पूरे मन से करना चाहिए।

बुद्धिर्ज्ञानम सम्मोहः क्षमा सत्यम् दमः शमः।
सुखं दुखं भावोअभावो भयं चाभयमेव च॥
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोयाशः।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः॥ (अध्याय १०, श्लोक ४-५)

अर्थ: निश्चय करने की शक्ति, यथार्थ ज्ञान, असम्मूढता, क्षमा, सत्य, इन्द्रियों का वश में करना, मन का निग्रह तथा सुख-दुःख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय तथा अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, कीर्ति और अपकीर्ति -- ऐसे ये प्राणियों के नाना प्रकार के भाव मुझसे ही होते हैं।

इन बातों को ध्यान में रखते हुए हमें यही सोचना चाहिए कि हमारा एकमात्र अधिकार हमारे कर्मों पर है। भावनाएं और परिस्थियाँ तो भगवान् की दी हुई होती हैं और कर्मों के द्बारा ही हमें उन पर खरे उतरने का अवसर मिलता है।

* गीताप्रेस (http://www.gitapress.org/)

Thursday, August 27, 2009

भविष्य का ज्ञान

सुनिए दो भाइयों का वार्तालाप वाल्मीकि रामायण में - भविष्य के ज्ञान के बारे में...
संवाद १


इसी श्रृंखला की कुछ और सुंदर कड़ियाँ बहुत से सुंदर जीवन मूल्यों के साथ...
* वाल्मीकि शाप - इस करुणामयी कथा से ऋषि वाल्मीकि को अंतर्ज्ञान आया और अपनी भावनाओं से सामना होता है। आगे आप ही देख लीजिये।

* लवकुश जन्म पूर्व संस्कार
भाग १ और भाग २

* राज दुविधा और परिवार धर्म
भाग १, भाग २, भाग ३, भाग ४, भाग ५...
भाग (सीता द्वारा भावना का विश्लेषण) और...
भाग ७ (त्याग की महिमा का सुंदर वर्णन किया है सीता जी ने...त्याग तो हम भारतीयों का वह गौरवशाली आभूषण है जिसे तिरंगा सबसे ऊपर केसरिये रंग से लहराता है।)

Friday, August 21, 2009

Ever tried searching in Hindi?

If you never searched in Hindi, you've missed out some great literature on the internet. Most of the search engines only capture pages that have English search tags associated with them. Try searching in Hindi on Google or any other search engine and you'll find some very good content on any topic. For example, use 'कबीर दोहे' to look for kabir dohas in Hindi.

To type in Hindi, either you download the hindi writer or copy your search text from somewhere like my blog. Then, enter this text in search engine box and search! I use a tool called HindiWriter and also the built-in tool on the blog site.

A good cause for the "I"

I have known 'Sankara Eye Foundation' since a long time and recently met some volunteers. The organization performs free eye surgery for poor and provides accomodation, medicine and food onsite. The first hospital opened in Coimbatore. But, recently an effort is being made to expand it all over india, including north, so that more people can avail the benefit. Here is the link to one planned for UP in 2011: http://www.giftofvision.org/focusup/FocusUP.htm.

Do take time to read and volunteer!! Remember, a good deed is more for your own benefit.

Wednesday, August 19, 2009

प्रेम

कबीर दास जी कहते हैं...

प्रेम न बारी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रूचै, सीस देइ लै जाय॥

प्रेम न तो खेत या बाड़े में उगता है और न ही हाट में बिकता है। चाहे राजा हो या प्रजा, जिसको सच्चा प्रेम चाहिए उसे अपना शीश तक देना पड़ता है क्योंकि किंचितमात्र अभिमान रखकर प्रेम नहीं किया जा सकता।

प्रेम पियाला जो पिए, सीस दक्षिना देय।
लोभी सीस न दे सके, नाम प्रेम का लेय॥

जिसको सच्चे प्रेम का रस चखना है, उसको अपने शीश को दक्षिणा में देना पड़ता है अर्थात उसे अभिमान का त्याग करना होता है। किंतु जो यह नहीं कर सकता और प्रेम का नाम लेता है, वह तो लोभी है जिसके अंदर त्याग की भावना नहीं हो सकती।

प्रेम भाव एक चाहिए, भेष अनेक बनाय।
चाहे घर में बास कर, चाहे बन को जाय॥

अपने अंदर प्रेम का भाव एक ही होना चाहिए, चाहे उसे आप जैसे भी दिखाएँ। कबीर दास जी भगवान् राम और भरत के प्रेम की ओर संकेत करके कहते हैं कि दोनों का प्रेम एक ही समान और अतुलनीय था। एक ने पिता के प्रति अपने प्रेम को वन जाकर निभाया था और दूसरे ने अपने भाई के प्रति प्रेम को राजमहल में सिंघासन पर खडाऊ रखकर निभाया था।

जे घट प्रेम न संचरै, ते घट जान समान।
जैसे खाल लुहार की, सांस लेत बिनु प्रान॥

जिसके हृदय में प्रेम नहीं है, वह जीव शमशान के सदृश्य भयानक एवं त्याज्य होता है। जिस प्रकार लुहार की धौंकनी के भरी हुई खाल बग़ैर प्राण के सांस लेती है उसी प्रकार वह जीव भी प्रेम के बिना मृत के समान शमशान स्वरुप होता है।

जल में बसै कमोदिनी, चंदा बसै अकास।
जो है जाको भावना, सो ताही के पास॥

जैसे कमल जल में खिलता है, चंद्रमा आकाश में रहता है। इस दुनिया की भी यही रीति है कि जिसको जो भाता है, वह उसी के पास रहता है।

भक्ति भाव भादों नदी, सबै चलीं घहराय।
सरिता सोइ सराहिये, जो जेठ मास ठहराय॥

वैसे तो भक्ति, भावना और वर्षा ऋतु (भादों) की नदी सभी घहरे दिखते हैं। लेकिन सराहना उसी की करनी चाहिए जो विपत्ति में भी साथ दे, जैसे नदी वही सराहनीय है जो गर्मी की ऋतु में भी जल देती है।

जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ, गहिरे पानी पैठ।
जो बौरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ॥

जिसने सच्चे प्रेम को ढूँढा, उसको वह मिल गया। लेकिन इसके लिए प्रेम की अनजान गहराइयों में उतरना पड़ता है। जो पागल इन गहराइयों में डूबने से डर गया, उसको प्रेम नहीं मिलता क्योंकि वह छिछले धरातल (किनारे) पर ही बैठा रह गया।

कहते हैं, हर रचना में अर्थ पर पाठक का अधिकार होता है, न कि कवि का। वही दुस्साहस करके मैंने इन दोहों के अर्थ लिखे हैं। त्रुटियों को क्षमा करें और आवश्यकतानुरूप सुझाएँ।

करेला (Bitter Gourd/Melon)

"करेला, वो भी नीम चढ़ा" ... I am sure you've heard that phrase before. Bitter gourd (or Karela) is simply bitter enough that you would mix it with that of neem. Some people just cannot get it down their throat willingly. Since old days in college, this vegetable has had the least number of fans in our hostel mess. But, that does not bring down its glory by any means when it comes to desire for reducing the blood sugar levels.

When we eat, the food is broken down in its basic components like glucose, protein and fat that are released in the blood. The glucose is absorbed by the body cells for energy with the help of insulin released by Pancreas. But, a lack of enough absorption leaves glucose in the blood itself and starts to damage other vital organs in long term. This condition is known as Diabetes.

The purpose behind my explanation is that Karela has been used since ages in reducing blood sugar. There are many recipes and ways in which Karela can be consumed, some of which will be liked by even people who hate it. For example, it can be cooked as chopped vegetable or, as whole with stuffing or, as juice or, as pickle or, even body oil. Recently, I saw an episode of Baba Ramdev who mentioned that an equal mix of karela, tomato and cucumber when made into unfiltered juice in a mixer and consumed empty stomach in the morning reduced the blood sugar in many people. I believe this mixture will add the benefits of other vegetables while reducing the bitterness of karela. But, I will focus on its benefits rather than taste here. Your taste buds can be trained in a short time when you start practising discipline. Once you start taking extra sugar every time, you will find that many food items will start tasting bland or less sweet. Same effect can be had in opposite by reducing the sugar intake. Taste buds always adjust to the habits of anyone. Same goes for moral tastes, but that's for another story.

So, try this amazing vegetable once in a while, of course, after cooking it. In the meantime, I will get back to training myself in eating more karela. As always, one of these days, I will visit my village where they make everything fresh and delicious from scratch!

Sunday, August 2, 2009

कबीर दोहा

निम्नांकित अर्थ मेरा अपनी मंद बुद्धि का समझा हुआ है। यदि यह ग़लत है, तो क्षमा करें और सही अर्थ सुझाएँ।

कबीर दास का यह दोहा जीवन के मोह के बारे में कहता है कि हमको जीवन के उतार चढाव में निर्भाव रहना चाहिए।

जाता है तो जान दे, तेरी दशा ना जाई।
केवटिया की नाव ज्यूँ, चढ़े मिलेंगे आई॥

अर्थ: कबीर दास कहते हैं..... जो जाता है उसको जाने देना चाहिए। व्यर्थ में अपनी दशा ख़राब नहीं करनी चाहिए। क्योंकि जिसको आना होता है, वो केवट की नाव चढ़कर आ जाता है। इस सन्दर्भ में कबीर दास भगवान् राम को ओर इशारा करते हैं, जो यमुना नदी के उस पार केवट की नाव पर चढ़ कर शबरी से मिलने पहुँच गए थे।

Thursday, July 30, 2009

Power of Imagination

What can imagination do for you? Just imagine and you might find out:

Imagination is powered by our experiences, intuition and a powerful inner tool called brain. The brain is very much programmed for survival instincts first and then, for any other needs. The signals received by this organ are analyzed in this order before any instructions are sent out to other organs in millions per second. These instincts of survival give the body its resilience in adverse circumstances. Through experiences, we have survived by being wary of the unwanted situations using these survival instincts. Evolution process has strengthened these instincts. Nothing comes before the survival is ensured. These instincts are always present in our minds and make us argue against any 'non-normal' imagination to keep us from 'unknown harm'. That's why, accomplishing certain 'unimaginable' wonders outside of our normal functions requires training of this brain under discipline. Very few venture in such training.

But, what would require such training? Imagine the following circumstances:

* Strong desire to succeed -- Be it in your life, ventures or even relationships. Strong positive desire can do wonders. But, mind, being surrounded by survival instincts including fear, also presents negative results. History is full of examples of continuous failures of people who just did not know how to give up. Their persistence and determination brought bigger obstacles to knees. To achieve such miracles, brain must be trained to withstand long periods of hard work (or penance) because good things do require a test of the strength of your desire.

* Painful experience of the body and/or mind -- Normal would be to cope with the grief in stages over time. Extra would be accept it sooner as destiny and search for a 'worthy' lesson outside of own emotions. Every experience is part of the process that has sharpened our survival instincts. The training of the mind also comes during these periods. In dirt hides the diamond. You just have to find these diamonds, polish them and then you'll see their real beauty in the broader picture of life.

* Fear of change -- This is what keeps people stay put. Not many like the change because of its unknown parameters and consequences. But, as Gita says, 'Change is the law of Nature'. If you lose your own stubbornly-held perspective, you can dream and imagine the possibilities of the future. Actually put yourself in the shoe of the other person to understand their reaction/behavior. But, when the fear of change sets in you, introspect to learn what good will it bring after the change. Same goes for relationships. As we grow older, some habits start to firm up around which everyone searches for compatibility. But, what ensures easier match is the flexibility in our approach towards the other and some imagination of great unseen possibilities.

It is very hard to imagine any bad event is for your own good. And, if you appreciate the gift of life enough, you will later understand how that event was 'good' in shaping the course of your life. Our granths have repeatedly advised us to have faith and remember the impermanence of life. This brings coherence in our thought process and removes the curtain of doubt, fear and negativity.

Albert Einstein once said, "Imagination is more important than knowledge. For while knowledge defines all we currently know and understand, imagination points to all we might yet discover and create."

On the other note, think about what Blaise Pascal said, "Imagination disposes of everything; it creates beauty, justice, and happiness, which are everything in this world."

Friday, July 17, 2009

Faith and Logic

People look for inspiration in many corners and many forms. Everyone has their own method to getting it, be it the right way or not. I find a lot of inspiration in the beauty of character, emotions and faith in our hindu scriptures. But, some argue that reading such religious scriptures should be reserved for old age. I feel that people relate these religious books to offering prayer to the god. However, that perception may just point to the lost meaning of the originality of these books in their minds.

In fact, a book like Ramcharitmanas should be studied to understand and adopt the great character (charit) of the idealism shown by lord Ram. The real meaning of its dohas and chaupais can only be understood when analyzed in depth, and not just in literal sense. It cannot just be recited in hurry to complete with belief that you'll please the god through such actions. The words are decorated by Tulsidas ji using Alankar (or adjectives) that beautify the meaning and show the real depth of emotions. Unless you've really immersed yourself in the meaning of these emotions by putting yourself in the situation, you can hardly realize the beauty of their depth, guiding thoughts and real life lessons. Giving others your love is one of such lessons; Having faith is another.

Faith, in my opinion, is the least realized strength of much of the population. Faith cannot be explained by logic. It forms through strong belief and gets better through life experiences, devotion and discipline. But, it can be severely challenged by the human psyche that induces logic. One that is hard to understand cannot be fathomed by our own logic which rationalizes day-to-day events for us. In the circumstances of intense negativity, one becomes prone to losing faith over logic. This further induces decision-making based on facts that would make sense to the normal human psyche. On the other hand, faith is the strong belief that brings sanity and optimism. Human mind and body are programmed to rebound from adversities through the eternal evolution process. But, logic prevents us to think highly of our own capabilities in adverse situations. We may think that - situation is so overpowering; there is no god, etc. But, that brings us to the stage of doubt that neither gets you the logical result nor the inner contentment obtained by faith in the ultimate success. This is where religious scriptures play a beautiful role. They demonstrate through examples and guide us towards the best possible virtues.

It is easy to lose courage, get anxious or sometimes even cry on adverse results. But, think this when you are in such situations that, god is putting you through it to save YOU from something even worse in the future. You are learning it now and will be able to better handle it in the future. This type of thinking will bring you the positive attitude in starting to accept many adverse events as learning experiences rather than failures. Life is never lived in parts; It's a continuous experience over lifetimes. ANY event in our lives should be thought of as our destiny because this strengthens your faith and keeps away negative attitude. As long as we do our karm (duties) right, we should not worry about negative events, as they may come from outside of your control.

In fact, when you read any book (religious or not), read it with the same faith and devotion with which it was written. And, read it patiently, in depth, to understand and enjoy the actual moment that went into its lines and use your imagination to possibly apply those good virtues in your life. And, then you'll find that these are not merely post-retirement reading material, but a collection of rare gems that you uncovered through your own curious soul and true introspection in the depths of your psyche.

Sunday, July 5, 2009

नवधा भक्ति (राम-शबरी संवाद)




राम ने शबरी को नवधा भक्ति के बारे में ज्ञान दिया था:
Shri Ram explains the nine types of devotion or penance:

अवधी भाषा में (रामचरितमानस से)
(सुनिए इस संवाद को
यहाँ पर)



नवधा भगति कहउं तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दुसरि रति मम कथा प्रसंगा॥
The nine ways of devotion, I impart to you. Listen you well and remember it always. The first is, fellowship with saints (or good company). The second, fondness for legends of the Lord.

गुरु पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥
Selfless service to the Guru's lotus feet is the third way. The fourth, hymns to the Lord's virtues with a heart clear of guile or deceipt.

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥
छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥
Chanting my mystic name with steadfast faith is the fifth way as the Vedas reveal. The sixth, is to practice self-control, good character, detachment from manifold activities and always follow the duties as good religious person.

सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुं नहिं देखइ परदोषा॥
The seventh sees the whole world as the Lord and regards the saints higher than the Lord. The eighth, enjoins contentment with what one has. And, dream not of finding faults in others.

नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हिय हरष न दीना॥
नव महुं एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरूष सचराचर कोई॥
सोइ अतिसय प्रिय भामिनी मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥
The ninth demands simplicity and behavior without deceit with all. And, to have strong faith in the Lord with neither exhaltation nor depression in any life circumstance. Anyone with any of the nine types of devotion is very dear to me. Then, you, dear shabri, have all of the above.

सरल हिन्दी में
(सुनिए इस संवाद को यहाँ पर)

प्रथम संत सत्संग सुहाना। साधु संग से उपजे ग्याना॥
दूजी भक्ति परम सुख दाता। चित्त लगा सुन मेरी गाथा॥

तज अभिमान करो गुरु सेवा। ब्रह्म विष्णु शिव सम गुरु देवा॥
हो निष्कपट मेरा गुन गायन। करे सो पावे राम रसायन॥

दृढ़ विश्वास राख निज अन्तर। राम मंत्र कर जाप निरंतर॥
इन्द्रिय वश कर चरित संभालो। सद्गुण धार धर्म नित पालो॥

सारा जगत राममय जानो। मुझसे अधिक संतों को मानो॥
एक संतोष सकल सुख लाये। सपनेहु गिनो न दोष पराये॥

सरल प्रकृति निष्छल ब्यवहारी। मुझ पर रखो भरोसा भारी॥
कोई भी स्थिति हो जीवन में। हर्ष विषाद न रखना मन में॥

नवधा भक्ति ह्रदय जो राखे। मेरी कृपा का फल वो चाखे॥

Saturday, June 27, 2009

जन्मों के नाते

Babu Moshaiiiiii, remember these beautiful melodies...

कहीं तो ये, दिल कभी, मिल नहीं पाते।
कहीं पे निकल आयें, जन्मों के नाते।

More at this link.

Link TV

I found a very good channel called "Link TV", offered by Dish Network. Some very good international programming on this one...

"Shortcut to Nirvana" ...A documentary on Kumbh Mela and spirituality
"The Kite" ...A story of love and marriage in the life of a Palestinian girl

Monday, June 22, 2009

Monday, June 15, 2009

From the sweet comedy of Daya...

फाफरा है सीधा और, जलेबी है गोल...
मैं हूँ आपकी बाँसुरी और, आप हैं मेरे ढोल ।

Monday, June 8, 2009

Ayurvedic remedy for cough

Try Kanth Sudharak Vati (कंठ सुधारक वटी) from UAP Pharma (Unjha)!!!

It works like a charm on cough, sore throat etc. It sells in most of the ayurvedic medicine shops in India. I tried a 10gm little bottle that contains mini round ayurvedic pills that taste good and work immediately. But, if you want to prepare your own, mulethi is one of the good ingredient to start with.

Thursday, June 4, 2009

जो राम रचि राखा...

बहुत दिनों से यह चौपाई सुनते सुनते मैंने सोचा कि देखें इसका प्रयोग किस सन्दर्भ में हुआ है। शिव जी ने सती जी द्वारा राम परीक्षा लेने से पहले यह कहा है, जब उनके बहुत समझाने पर भी सती नहीं मानतीं हैं। लेकिन इस चौपाई का इस्तेमाल हर जगह होता है क्योंकि यही सत्य है...

होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥ [बालकाण्ड दोहा ५१ चौपाई ४]
जो कुछ राम ने रच रखा है, वही होगा। तर्क करके कौन शाखा (विस्तार) बढ़ावे।

उसी तरह एक और चौपाई जो शिवजी नारद जी को कहते हैं। ऐसा उन्होंने तब कहा था, जब नारद जी को अंहकार आ गया था कि उन्होंने भी कामदेव को जीत लिया है...

राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई। करै अन्यथा अस नहिं कोई॥ [बालकाण्ड दोहा १२७ चौपाई १]
श्रीरामजी जो करना चाहते हैं, वही होता है। ऐसा कोई नहीं जो उसके विरुद्ध कर सके।

Monday, May 25, 2009

Today's TOI quotes on victory


[Click on image to read]

Saturday, May 9, 2009

Love-struck

Somehow reached at this website...I liked the selection of very no-nonsense picks of GA girl on life and love (more on sidebar): http://www.gagirl.com/quotes/life.html.

Eternity is in love with the productions of time.
--William Blake

Wednesday, April 22, 2009

Interesting article on Gun Milap

I found an neatly-edited article about Gun Milap on the web. The unique thing it teaches on how to calculate the individual Kutas as well, besides a sum of all 7 of them. Take a read by clicking here.

Some of you may not believe in these things at all. I respect your opinion that way. But, I must say that many ancient jyotish calculations are based on very accurate calculations based on movement of planets. In high-school we study about the gravitational forces, depicted by constant 'G'. So, at least, believe that big bodies do influence other bodies in this universe. Interestingly, Vimshottari dasha is also calculated based on such influences. If you want to do some research on it, you will find out how it is calculated. Most pundits agree that Vimshottari dasha is one such calculation that is very close to being amazingly accurate, if analyzed properly.

Monday, April 20, 2009

Infant of the zodiac

People ask me why I call myself an optimist on this blog. Besides telling them that I am one, I tried to find out why it is so.

Was it because of life circumstances while growing up, or something more profound as effect of planets on me? It surprisingly comes very close. I have been brought up in the environment where people have set very proud examples to come out of extreme hardships or difficult life situations, even before my birth. On the other hand, it could be that the planet Mars (Lord of Aries) just had enough influence during my birth and I absorbed the flavor of the infant of the zodiac. Remember, how an infant is. A baby is very optimistic that he will get what he wants. The baby gets upset one moment and then forgets and smiles the next moment. The star signs possibly inculcate those instincts in any of its members they influence.

When I was a baby, my mother tells a story that when I got a bit stubborn for something that she didn't want to give, I will keep crying for 5 minutes, sitting close to her. Then, the next moment I will get distracted by a big ant crawling on the floor and stop crying. My mom used to just smile at that.

That was then. Now, that I have grown up, I don't do that anymore. :-) Part of the optimism comes from my strong belief that God has made me capable to achieve anything. But, if I keep asking, he is just going to laugh at it. Karm Yog teaches us that we are bound by our karmas, on which we have the control and not on the outcome. So, why not see the silver lining on every cloud you see. Too often people take events negatively or think of something that happened to them as bad part of destiny. Think of Geeta, you'll get only that much what you have been assigned. So, why worry and waste the precious life!!

Every human has hidden sleeping inner powers that can be harnessed to achieve anything. These powers put optimism and resilience in you that can sail you through any storm. So, go for it.

Saturday, April 11, 2009

Saturday, April 4, 2009

Ancient laws of marriage

I found something online that was compiled from multiple texts on marriage. Read and judge for yourself: http://www.hindujagruti.org/hinduism/knowledge/article/which-factors-are-considered-while-arranging-marriage.html

Friday, April 3, 2009

सत्य का भ्रम

दो बहुत ही सुंदर कहानियाँ, एक रामायण से और एक महाभारत से, मैं आपको सुनाता हूँ। दोनों ही कहानियाँ इस बात को बताती हैं कि आंखों देखा और कानों सुना भी हर समय सम्पूर्ण सत्य नहीं होता। इसलिए कभी कभी स्वयं अपने अनुभव को भी बुद्धि और विवेक के तराजू में तौल लेना चाहिए।

१. भीम-हनुमान संवाद (महाभारत)
एक बार जब कुंती-पुत्र भीम जंगल से जा रहे थे, तभी रास्ते में एक बूढा बंदर बैठा हुआ देखते हैं जिसकी लम्बी पूँछ रास्ते में पड़ी हुई थी। भीम उसको लाँघ कर नहीं जाना चाहते थे और अंहकार में बन्दर से पूँछ हटाने के लिए कहा। बंदर ने कहा, स्वयं ही हटा दीजिये, मुझमें ताकत नहीं है। भीम ने लाख कोशिश की, लेकिन पूँछ नहीं हिली। तब क्षमा मांगने पर हनुमान जी प्रगट हुए। वो बोले...निर्बल और वृद्ध का आदर करना चाहिए और जो आँखें देखती हैं, वह सदा सत्य नहीं होता। जैसे भीम ने बन्दर को बूढा जानकर उसको अंहकार दिखाया और चुनौती दी। परन्तु उस चुनौती से हार स्वयं भीम की ही हुई। इसलिए, हमेशा सत्य को पहचानने की कोशिश करो।

२. शिव-सती संवाद और सती की राम-परीक्षा
इस कथा में मैं आपको तुलसीदास जी की राम चरितमानस के ही शब्द सुनाता हूँ, क्योंकि उससे सुंदर वर्णन तो यहाँ सम्भव ही नहीं...

एक बार भगवान् शिव अपनी पत्नी सती जी के साथ अगस्त्य मुनि (कुम्भज) के आश्रम में गए और राम कथा विस्तार से कही और सुनी। उन्ही दिनों भगवान् राम वनवास लेकर अपने भाई लक्ष्मण के साथ दंडक वन में रहते थे। रावण द्वारा सीता हरण हो चुका था, इसलिए वो बहुत व्याकुल रहते थे। इधर शिव जी राम के दर्शन के लिए अति विभोर थे। दोनों का एक दूसरे के प्रति प्रेम तो जग प्रसिद्द है। केवल वे ही राम जी की मनुष्य लीला को समझते थे। तुलसी जी कहते हैं...

बिरह बिकल नर इव रघुराई। खोजत बिपिन फिरत दोउ भाई॥
कबहूँ जोग बियोग न जाके। देखा प्रगट बिरह दुखु ताँके॥
श्रीरघुनाथ जी मनुष्यों की भांति विरह से व्याकुल हैं और दोनों भाई वन में सीता को खोजते फिर रहे हैं। जिनके कभी संयोग-वियोग नहीं है, उनमें प्रत्यक्ष विरह का दुःख देखा गया है।

अति बिचित्र रघुपति चरित जानहिं परम सुजान।
जे मतिमंद बिमोह बस हृदयं धरहिं कछु आन॥
श्रीरघुनाथ जी का चरित्र बड़ा ही विचित्र है, उसको पहुंचे हुए ज्ञानीजन ही जानते हैं। जो मंदबुद्धि हैं, वे तो विशेषरूप से मोह के वश होकर ह्रदय में कुछ दूसरी ही बात समझ बैठते हैं।

उसी अवसर पर शिवजी ने श्रीराम को देखा और उनके ह्रदय में बहुत भारी आनंद उत्पन्न होता है। किंतु अवसर ठीक न जानकर उन्होंने अपना परिचय नहीं दिया, ताकि सब लोगों को श्रीराम का भेद न पता चल जाए। 'जगत को पवित्र करने वाले सच्चिदानंद की जय हो' ऐसा कह कर शिवजी चल देते हैं। वे बार-बार आनंद से पुलकित होकर सतीजी के साथ चले जा रहे थे। जब सतीजी ने शम्भु जी की यह दशा देखी, तो उनको बहुत संदेह हुआ। वे सोचने लगीं कि शिवजी जिनको सारा संसार पूजता है, उन्होंने एक राजा के पुत्र को सच्चिदानंद कहकर प्रणाम किया और प्रेम में इतने पुलकित हो गए! और फिर विष्णु जी जो शिवजी की ही तरह सर्वज्ञ हैं, वे क्या अज्ञानी की तरह स्त्री को खोजते फिरेंगे? सतीजी जानतीं थीं कि शिवजी का वचन मिथ्या नहीं हो सकता। लेकिन संदेह दूर नहीं हो रहा था...

जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी। हर अंतरजामी सब जानी॥
सुनहि सती तव नारि सुभाऊ। संसय अस न धरिअ उर काऊ॥
यद्यपि भवानी जी ने कुछ नहीं कहा, पर शिवजी उनके मन की बात जान गए। वे बोले- हे सती! सुनो, तुम्हारा स्त्रीस्वभाव है। ऐसा संदेह मन में कभी न रखना चाहिए।

लेकिन जब सतीजी बार-बार समझाने पर नहीं मानीं, तब शिवजी मुस्कुराते हुए बोले-तुम जाकर उनकी परीक्षा क्यों नहीं ले लेतीं, तब तुम्हें स्वयं पता चल जाएगा। इस पर सतीजी सोचने लगीं कि कैसे मैं श्रीराम की परीक्षा लूँ। तब...

पुनि पुनि हृदयं बिचारु करि धरि सीता कर रूप।
आगें होइ चलि पंथ तेहिं जेहिं आवत नरभूप॥
ऐसा विचार करके उन्होंने सीता का रूप बनाया और जिस रास्ते पर श्रीराम जा रहे थे, उसी पर चल पड़ीं।

लक्ष्मण जी उनको (सीता रूप) देख कर चकित हो गए और भ्रम में पड़ गए। लेकिन वे श्रीराम के प्रभाव को जानते थे। और फिर सीताजी को तो रावण हर ले गया था, तो वे वहां कैसे दिखतीं। लेकिन श्रीराम तो सब जानते थे...

सती कपटु जानेउ सुरस्वामी। सबदरसी सब अंतरजामी॥
सुमिरत जाहि मिटइ अग्याना। सोइ सरबग्य रामु भगवाना॥
सब कुछ देखने वाले और सबके ह्रदय की जानने वाले देवताओं के स्वामी श्रीरामचंद्रजी सती के कपट को जान गए। जिनके स्मरणमात्र से अज्ञान का नाश हो जाता है, वही सर्वज्ञ भगवान् श्रीरामचंद्र जी हैं।

तब श्रीरामजी हंसकर कोमल वाणी से बोले-
जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू।
कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू। बिपिनि अकेलि फिरहु केहि हेतू॥
प्रभु ने हाँथ जोड़कर प्रणाम किया और अपना नाम पिता नाम सहित बताया। फिर कहा कि बृषकेतु (शिव) जी कहाँ हैं? आप यहाँ वन में अकेली किसलिए फिर रहीं हैं?

ऐसा सुन कर पार्वतीजी को बहुत लज्जा आई और शिवजी के पास वापस चली आयीं। आगे शिव जी को भी बहुत संताप हुआ और उन्होंने पार्वतीजी को त्याग दिया क्योंकि उन्होंने परीक्षा के लिए सीता जी का रूप धारण किया था, जो उनके प्रिय राम की पत्नी का रूप था। इसके आगे बाद में बताऊंगा या आप बालकाण्ड में दोहा ५४ से आगे पढ़ लीजियेगा।

इस कहानी का तात्पर्य भी यही है कि हर बार अपने अनुभव में जो कुछ भी आता है या दिखता है, वह जरुरी नहीं कि सत्य ही हो। फिर भी हमें अपना अहम् और विवेक की कमी उसको सत्य मानने पर विवश अवश्य कर देता है। जीवन के अनेक इस तरह के अवसरों पर सत्य को पहचानना सीखिए, तो बहुत से दुखों से सहज ही छुटकारा मिल जाएगा।