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Tuesday, November 25, 2014

प्रभु लीला

प्रभु श्री राम स्वयं ही परम ब्रह्म हैं।  श्री भागवत महापुराण के प्रथम स्कंध के दूसरे अध्याय में यह स्पष्ट है कि त्रिगुणी प्रकृति से इस संसार की स्थिति, उत्पति और प्रलय के लिए यही ब्रह्म (परमात्मा) ही विष्णु, ब्रह्मा और रूद्र रूप ग्रहण करते हैं।  इसलिए श्रीराम को बस अवतार न समझ कर उन प्रभु में निर्गुण ब्रह्म को ही देखिए और भक्ति को उस ब्रह्म के साक्षात्कार का साधन। 

आगे लिखा है कि धर्म के ठीक-ठीक अनुष्ठान करने पर भी यदि ह्रदय में भगवान की लीला-कथाओं में अनुराग का उदय न हो, तो वह निरा कर्म ही है।  आतम ज्ञान बिना नर भटके, कभी मथुरा, कभी काशी।  परमात्मा आपके ह्रदय में ही हैं।  सच्ची भक्ति वही है जिससे ज्ञान और वैराग्य का उदय हो।  ज्ञान भगवान को तत्व से जानने को कहते हैं और वैराग्य आसक्ति के हटने को।   तत्व से जानना अर्थात उनकी कृपा को बहुत कृतज्ञता से देखना और इस जीवन को अंत न समझ लेना।  जीवन के कर्म करते हुए भी फल में आसक्ति का न होना। जो प्रभु दें, उसको सहर्ष स्वीकार करना।  मोह ही अज्ञान है।   मोह सकल ब्याधिन के मूला, तिन्हते पुनि उपजहिं बहु सूला।  इसलिए भक्ति से ज्ञान और ज्ञान से प्रभु में विश्वास अधिक दृढ होना चाहिए। 

तुलसीदास जी उनकी लीला का सुन्दर वर्णन करते हैं...

प्रेम मगन कौसल्या निसिदिन जात न जान।
सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान।।  (बालकाण्ड दो० २००)
प्रेम में मग्न कौसल्याजी रात और दिन का बीतना नहीं जानती थीं। पुत्र के स्नेहवश माता उनके बालचरित्रों का गान किया करतीं।।

एक बार जननीं अन्हवाए। करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाए।।
निज कुल इष्टदेव भगवाना। पूजा हेतु कीन्ह अस्नाना।।
एक बार माता ने श्री रामचन्द्रजी को स्नान कराया और श्रृंगार करके पालने पर पौढ़ा दिया। फिर अपने कुल के इष्टदेव भगवान की पूजा के लिए स्नान किया।।
 
करि पूजा नैबेद्य चढ़ावा। आपु गई जहँ पाक बनावा।।
बहुरि मातु तहवाँ चलि आई। भोजन करत देख सुत जाई।।
पूजा करके नैवेद्य चढ़ाया और स्वयं वहाँ गईं, जहाँ रसोई बनाई गई थी। फिर माता वहीं (पूजा के स्थान में) लौट आई और वहाँ आने पर पुत्र को (इष्टदेव भगवान के लिए चढ़ाए हुए नैवेद्य का) भोजन करते देखा।।
 
गै जननी सिसु पहिं भयभीता। देखा बाल तहाँ पुनि सूता।।
बहुरि आइ देखा सुत सोई। हृदयँ कंप मन धीर न होई।।
माता भयभीत होकर (पालने में सोया था, यहाँ किसने लाकर बैठा दिया, इस बात से डरकर) पुत्र के पास गई, तो वहाँ बालक को सोया हुआ देखा। फिर (पूजा स्थान में लौटकर) देखा कि वही पुत्र वहाँ (भोजन कर रहा) है। उनके हृदय में कम्प होने लगा और मन को धीरज नहीं होता।।
 
इहाँ उहाँ दुइ बालक देखा। मतिभ्रम मोर कि आन बिसेषा।।
देखि राम जननी अकुलानी। प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुसुकानी।।
(वह सोचने लगी कि) यहाँ और वहाँ मैंने दो बालक देखे। यह मेरी बुद्धि का भ्रम है या और कोई विशेष कारण है? प्रभु श्री रामचन्द्रजी माता को घबड़ाई हुई देखकर मधुर मुस्कान से हँस दिए।।
 
देखरावा मातहि निज अद्भुत रूप अखंड।
रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड।।  (बालकाण्ड दो० २०१)  
फिर उन्होंने माता को अपना अखंड अद्भुत रूप दिखलाया, जिसके एक-एक रोम में करोड़ों ब्रह्माण्ड लगे हुए हैं।।
 
अगनित रबि ससि सिव चतुरानन। बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन।।
काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ। सोउ देखा जो सुना न काऊ।।
अगणित सूर्य, चन्द्रमा, शिव, ब्रह्मा, बहुत से पर्वत, नदियाँ, समुद्र, पृथ्वी, वन, काल, कर्म, गुण, ज्ञान और स्वभाव देखे और वे पदार्थ भी देखे जो कभी सुने भी न थे।।
 
देखी माया सब बिधि गाढ़ी। अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी।।
देखा जीव नचावइ जाही। देखी भगति जो छोरइ ताही।।
सब प्रकार से बलवती माया को देखा कि वह (भगवान के सामने) अत्यन्त भयभीत हाथ जोड़े खड़ी है। जीव को देखा, जिसे वह माया नचाती है और (फिर) भक्ति को देखा, जो उस जीव को (माया से) छुड़ा देती है।।
 
तन पुलकित मुख बचन न आवा। नयन मूदि चरननि सिरु नावा।।
बिसमयवंत देखि महतारी। भए बहुरि सिसुरूप खरारी।।
(माता का) शरीर पुलकित हो गया, मुख से वचन नहीं निकलता। तब आँखें मूँदकर उसने श्री रामचन्द्रजी के चरणों में सिर नवाया। माता को आश्चर्यचकित देखकर खर के शत्रु श्री रामजी फिर बाल रूप हो गए।।
 
अस्तुति करि न जाइ भय माना। जगत पिता मैं सुत करि जाना।।
हरि जननी बहुबिधि समुझाई। यह जनि कतहुँ कहसि सुनु माई।।
(माता से) स्तुति भी नहीं की जाती। वह डर गई कि मैंने जगत्पिता परमात्मा को पुत्र करके जाना। श्री हरि ने माता को बहुत प्रकार से समझाया (और कहा-) हे माता! सुनो, यह बात कहीं पर कहना नहीं।।

Sunday, July 5, 2009

नवधा भक्ति (राम-शबरी संवाद)




राम ने शबरी को नवधा भक्ति के बारे में ज्ञान दिया था:
Shri Ram explains the nine types of devotion or penance:

अवधी भाषा में (रामचरितमानस से)
(सुनिए इस संवाद को
यहाँ पर)



नवधा भगति कहउं तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दुसरि रति मम कथा प्रसंगा॥
The nine ways of devotion, I impart to you. Listen you well and remember it always. The first is, fellowship with saints (or good company). The second, fondness for legends of the Lord.

गुरु पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥
Selfless service to the Guru's lotus feet is the third way. The fourth, hymns to the Lord's virtues with a heart clear of guile or deceipt.

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥
छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥
Chanting my mystic name with steadfast faith is the fifth way as the Vedas reveal. The sixth, is to practice self-control, good character, detachment from manifold activities and always follow the duties as good religious person.

सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुं नहिं देखइ परदोषा॥
The seventh sees the whole world as the Lord and regards the saints higher than the Lord. The eighth, enjoins contentment with what one has. And, dream not of finding faults in others.

नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हिय हरष न दीना॥
नव महुं एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरूष सचराचर कोई॥
सोइ अतिसय प्रिय भामिनी मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥
The ninth demands simplicity and behavior without deceit with all. And, to have strong faith in the Lord with neither exhaltation nor depression in any life circumstance. Anyone with any of the nine types of devotion is very dear to me. Then, you, dear shabri, have all of the above.

सरल हिन्दी में
(सुनिए इस संवाद को यहाँ पर)

प्रथम संत सत्संग सुहाना। साधु संग से उपजे ग्याना॥
दूजी भक्ति परम सुख दाता। चित्त लगा सुन मेरी गाथा॥

तज अभिमान करो गुरु सेवा। ब्रह्म विष्णु शिव सम गुरु देवा॥
हो निष्कपट मेरा गुन गायन। करे सो पावे राम रसायन॥

दृढ़ विश्वास राख निज अन्तर। राम मंत्र कर जाप निरंतर॥
इन्द्रिय वश कर चरित संभालो। सद्गुण धार धर्म नित पालो॥

सारा जगत राममय जानो। मुझसे अधिक संतों को मानो॥
एक संतोष सकल सुख लाये। सपनेहु गिनो न दोष पराये॥

सरल प्रकृति निष्छल ब्यवहारी। मुझ पर रखो भरोसा भारी॥
कोई भी स्थिति हो जीवन में। हर्ष विषाद न रखना मन में॥

नवधा भक्ति ह्रदय जो राखे। मेरी कृपा का फल वो चाखे॥